महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2379, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान्के ऐसा कहनेपर अर्जुन उस समय कर्णके प्रति अत्यन्त कुपित हो उठे। उसकी पिछली करतूतोंको याद करके उनके मनमें भयानक रोष जाग उठा ।। १८ ।। तस्य क्रुद्धस्य सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः । प्रादुरासंस्तदा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १९ ॥ कुपित होनेपर उनके सभी छिद्रोंसे—रोम-रोमसे आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं। राजन्! उस समय वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १९ ॥ तत् समीक्ष्य ततः कर्णो ब्रह्मास्त्रेण धनंजयम् । अभ्यवर्षत् पुनर्यत्नमकरोद् रथसर्जने ॥ २० ॥ यह देख कर्णने अर्जुनपर ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके बाणोंकी झड़ी लगा दी और पुनः रथको उठानेका प्रयत्न किया ॥ २० ॥ ब्रह्मास्त्रेणैव तं पार्थो ववर्ष शरवृष्टिभिः । तदस्त्रमस्त्रेणावार्य प्रजहार च पाण्डवः ॥ २१ ॥ तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने भी ब्रह्मास्त्रसे ही उसके अस्त्रको दबाकर उसके ऊपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी और उसे अच्छी तरह घायल किया ॥ २१ ॥ ततोऽन्यदस्त्रं कौन्तेयो दयितं जातवेदसः । मुमोच कर्णमुद्दिश्य तत् प्रजज्वाल तेजसा ॥ २२ ॥ तदनन्तर कुन्तीकुमारने कर्णको लक्ष्य करके दूसरे दिव्यास्त्रका प्रयोग किया जो जातवेदा अग्निका प्रिय अस्त्र था। वह आग्नेयास्त्र अपने तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ २२ ॥ वारुणेन ततः कर्णः शमयामास पावकम् । जीमूतैश्च दिशः सर्वाश्चक्रे तिमिरदुर्दिनाः ॥ २३ ॥ परंतु कर्णने वारुणास्त्रका प्रयोग करके उस अग्निको बुझा दिया। साथ ही सम्पूर्ण दिशाओंमें मेघोंकी घटा घिर आयी और सब ओर अन्धकार छा गया ॥ २३ ॥ पाण्डवेयस्त्वसम्भ्रान्तो वायव्यास्त्रेण वीर्यवान् । अपोवाह तदाभ्राणि राधेयस्य प्रपश्यतः ॥ २४ ॥ पराक्रमी अर्जुन इससे विचलित नहीं हुए। उन्होंने राधापुत्र कर्णके देखते-देखते वायव्यास्त्रसे उन बादलोंको उड़ा दिया ॥ २४ ॥ ततः शरं महाघोरं ज्वलन्तमिव पावकम् । आददे पाण्डुपुत्रस्य सूतपुत्रो जिघांसया ॥ २५ ॥ तब सूतपुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनका वध करनेके लिये जलती हुई आगके समान एक महाभयंकर बाण हाथमें लिया ॥ २५ ॥ योज्यमाने ततस्तस्मिन् बाणे धनुषि पूजिते । चचाल पृथिवी राजन् सशैलवनकानना ॥ २६ ॥