महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2391, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथायथैषां प्रकृतिस्तथाभवन् ॥ ४ ॥ कोई प्रसन्न था तो कोई भयभीत। कोई विषादग्रस्त था तो कोई आश्चर्यचकित तथा दूसरे बहुत-से लोग शोकसे मृतप्राय हो रहे थे। आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जिसकी जैसी प्रकृति थी, वे परस्पर उसी भावमें मग्न थे ॥
प्रविद्धवर्माभरणाम्बरायुधं धनंजयेनाभिहतं महौजसम् । निशाम्य कर्णं कुरवः प्रदुद्रुवु- र्हतर्षभा गाव इवाजने वने ॥ ५ ॥ जिसके कवच, आभूषण, वस्त्र और अस्त्र-शस्त्र छिन्न-भिन्न होकर पड़े थे, उस महाबली कर्णको अर्जुनद्वारा मारा गया देख कौरव-सैनिक निर्जन वनमें साँड़के मारे जानेपर भागनेवाली गायोंके समान इधर-उधर भाग चले ॥
भीमश्च भीमेन तदा स्वनेन नादं कृत्वा रोदसीः कम्पयानः । आस्फोटयन् वल्गते नृत्यते च हते कर्णे त्रासयन् धार्तराष्ट्रान् ॥ ६ ॥ कर्णके मारे जानेपर धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भयभीत करते हुए भीमसेन भयंकर स्वरसे सिंहनाद करके आकाश और पृथ्वीको कँपाने तथा ताल ठोंककर नाचने-कूदने लगे ॥
तथैव राजन् सोमकाः सृञ्जयाश्च शङ्खान् दध्मुः सस्वजुश्चापि सर्वे । परस्परं क्षत्रिया हृष्टरूपाः सूतात्मजे वै निहते तदानीम् ॥ ७ ॥ राजन्! इसी प्रकार समस्त सोमक और सृंजय भी शंख बजाने और एक-दूसरेको छातीसे लगाने लगे। सूतपुत्रके मारे जानेपर उस समय पाण्डवदलके सभी क्षत्रिय परस्पर हर्षमग्न हो रहे थे ॥ ७ ॥
कृत्वा विमर्दं महदर्जुनेन कर्णो हतः केसरिणेव नागः । तीर्णा प्रतिज्ञा पुरुषर्षभेण वैरस्यान्तं गतवांश्चापि पार्थः ॥ ८ ॥ जैसे सिंह हाथीको पछाड़ देता है, उसी प्रकार पुरुषप्रवर अर्जुनने बड़ी भारी मार-काट मचाकर कर्णका वध किया, अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और उन्होंने वैरका अन्त कर दिया ॥ ८ ॥
मद्राधिपश्चापि विमूढचेता- स्तूर्णं रथेनापकृतध्वजेन ।