महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2396, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यालतस्करसंकीर्णे सार्थहीना यथा वने । सूतपुत्रे हते राजंस्तव योधास्तथाभवन् ॥ १३ ॥ राजन्! जैसे सर्पों और चोरों-बटमारोंसे भरे हुए वनमें अपने दलसे बिछुड़े हुए लोग अनाथ हो भारी विपत्तिमें पड़ जाते हैं, सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके योद्धाओंकी भी वैसी ही दशा हो गयी ॥ १३ ॥
हतारोहा यथा नागाश्छिन्नहस्ता यथा नराः । सर्वे पार्थमयं लोकं सम्पश्यन्तो भयार्दिताः ॥ १४ ॥ जिनके सवार मारे गये हों वे हाथी और जिनके हाथ काट लिये गये हों वे मनुष्य जैसी दुरवस्थामें पड़ जाते हैं वैसी ही दशामें पड़कर समस्त कौरव भयसे पीड़ित हो सारे जगत्को अर्जुनमय देखने लगे ॥ १४ ॥
सम्प्रेक्ष्य द्रवतः सर्वान् भीमसेनभयार्दितान् । दुर्योधनोऽथ स्वं सूतं हा हा कृत्वेदमब्रवीत् ॥ १५ ॥ महाराज! उस समय अपने समस्त योद्धाओंको भीमसेनके भयसे व्याकुल हो भागते देख दुर्योधनने हाहाकार करके अपने सारथिसे कहा— ॥ १५ ॥
नातिक्रमेच्च मां पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम् । जघने सर्वसैन्यानां शनैरश्वान् प्रचोदय ॥ १६ ॥ ‘सूत! तुम धीरे-धीरे रथ आगे बढ़ाओ। मैं सम्पूर्ण सेनाओंके पीछे जब हाथमें धनुष लेकर खड़ा होऊँगा, उस समय अर्जुन मुझे लाँघकर आगे नहीं बढ़ सकते ॥
युध्यमानं हि कौन्तेयं हनिष्यामि न संशयः । नोत्सहेन्मामतिक्रान्तुं वेलामिव महोदधिः ॥ १७ ॥ ‘यदि वे मुझसे युद्ध करेंगे तो मैं उन्हें निःसंदेह मार गिराऊँगा। जैसे महासागर अपनी तटभूमिको लाँघकर आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार वे भी मुझे लाँघ नहीं सकते ॥ १७ ॥
अद्यार्जुनं सगोविन्दं मानिनं च वृकोदरम् । हन्यां शिष्टांस्तथा शत्रून् कर्णस्यानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १८ ॥ ‘आज मैं अर्जुन, श्रीकृष्ण और उस घमंडी भीमसेनको तथा बचे-खुचे दूसरे शत्रुओंको भी मार डालूँ, तभी कर्णके ऋणसे मुक्त हो सकता हूँ' ॥ १८ ॥
तच्छ्रुत्वा कुरुराजस्य शूरार्यसदृशं वचः । सूतो हेमपरिच्छन्नान् शनैरश्वानचोदयत् ॥ १९ ॥ कुरुराज दुर्योधनकी वह श्रेष्ठ शूरवीरोंके योग्य बात सुनकर सारथिने सोनेके साज-बाजसे सजे हुए घोड़ोंको धीरे-धीरे आगे बढ़ाया ॥ १९ ॥
रथाश्वनागहीनास्तु पादातास्तव मारिष । पञ्चविंशतिसाहस्रा युद्धायैव व्यवस्थिताः ॥ २० ॥