भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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अष्टाविंशोऽध्यायः

संशप्तकोंका संहार करके अर्जुनका कौरव-सेनापर आक्रमण तथा भगदत्त और उनके हाथीका पराक्रम

संजय उवाच

यियासतस्ततः कृष्णः पार्थस्याश्वान् मनोजवान् ।
सम्प्रेषीद्धेमसंछन्नान् द्रोणानीकाय सत्वरन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! तदनन्तर द्रोणकी सेनाके समीप जानेकी इच्छावाले अर्जुनके सुवर्णभूषित एवं मनके समान वेगशाली अश्वोंको भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ द्रोणाचार्यकी सेनातक पहुँचनेके लिये हाँका ॥ १ ॥

तं प्रयान्तं कुरुश्रेष्ठं स्वान् भ्रातॄन् द्रोणतापितान् ।
सुशर्मा भ्रातृभिः सार्धं युद्धार्थी पृष्ठतोऽन्वयात् ॥ २ ॥
द्रोणाचार्यके सताये हुए अपने भाइयोंके पास जाते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको भाइयोंसहित सुशर्माने युद्धकी इच्छासे ललकारा और पीछेसे उनपर आक्रमण किया ॥ २ ॥

ततः श्वेतहयः कृष्णमब्रवीदजितं जयः ।
एष मां भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माऽऽह्वयतेऽच्युत ॥ ३ ॥
तब श्वेतवाहन अर्जुनने अपराजित श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा, 'अच्युत! यह भाइयोंसहित सुशर्मा मुझे पुनः युद्धके लिये बुला रहा है ॥ ३ ॥

दीर्यते चोत्तरेणैव तत् सैन्यं मधुसूदन ।
द्वैधीभूतं मनो मेऽद्य कृतं संशप्तकैरिदम् ॥ ४ ॥
'उधर उत्तर दिशाकी ओर अपनी सेनाका नाश किया जा रहा है। मधुसूदन! इन संशप्तकोंने आज मेरे मनको दुविधामें डाल दिया है ॥ ४ ॥

किं नु संशप्तकान् हन्मि स्वान् रक्षाम्यहितार्दितान् ।
इति मे त्वं मतं वेत्सि तत्र किं सुकृतं भवेत् ॥ ५ ॥
'क्या मैं संशप्तकोंका वध करूँ अथवा शत्रुओंद्वारा पीड़ित हुए अपने सैनिकोंकी रक्षा करूँ। इस प्रकार मेरा मन संकल्प-विकल्पमें पड़ा है, सो आप जानते ही हैं। बताइये, अब मेरे लिये क्या करना अच्छा होगा' ॥ ५ ॥

एवमुक्तस्तु दाशार्हः स्यन्दनं प्रत्यवर्तयत् ।
येन त्रिगर्ताधिपतिः पाण्डवं समुपाह्वयत् ॥ ६ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपने रथको उसी ओर लौटाया, जिस ओरसे त्रिगर्तराज सुशर्मा उन पाण्डुकुमारको युद्धके लिये ललकार रहा था ॥ ६ ॥