महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2419, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपके उन हजारों योद्धाओंमें वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो अपने मनमें उस महासमरमें युद्धके लिये उत्साह रखता हो ॥ १५ ॥
हते कर्णे महाराज निराशाः कुरवोऽभवन् ।
जीवितेष्वपि राज्येषु दारेषु च धनेषु च ॥ १६ ॥
महाराज! कर्णके मारे जानेपर कौरव अपने राज्यसे, धनसे, स्त्रियोंसे और जीवनसे भी निराश हो गये ॥ १६ ॥
तान् समानीय पुत्रस्ते यत्नेन महता विभुः ।
निवेशाय मनो दध्रे दुःखशोकसमन्वितः ॥ १७ ॥
दुःख और शोकमें डूबे हुए आपके पुत्र राजा दुर्योधनने बड़े यत्नसे उन सबको साथ ले आकर छावनीमें विश्राम करनेका विचार किया ॥ १७ ॥
तस्याज्ञां शिरसा योधाः परिगृह्य विशाम्पते ।
विवर्णवदना राजन् न्यविशन्त महारथाः ॥ १८ ॥
प्रजानाथ! वे सब महारथी योद्धा दुर्योधनकी आज्ञा शिरोधार्य करके शिविरमें प्रविष्ट हुए। उन सबके मुखोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शिविरप्रयाणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कौरव-सेनाका शिविरकी ओर प्रस्थानविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥