भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2427

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह अप्रिय समाचार सुनकर अम्बिकानन्दन

राजा धृतराष्ट्र निश्चेष्ट हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५४ ॥

तथा सा पतिता देवी गान्धारी दीर्घदर्शिनी ।

शुशोच बहुलालापैः कर्णस्य निधनं युधि ॥ ५५ ॥

इसी तरह दूरतक सोचनेवाली गान्धारी देवी भी पछाड़ खाकर गिरीं और बहुत विलाप

करती हुई युद्धमें कर्णकी मृत्युके लिये शोक करने लगीं ॥ ५५ ॥

तां पर्यगृह्णाद् विदुरो नृपतिं संजयस्तथा ।

पर्याश्वासयतां चैव तावुभावेव भूमिपम् ॥ ५६ ॥

उस समय विदुरजीने गान्धारी देवीको और संजयने राजा धृतराष्ट्रको सँभाला। फिर

दोनों ही मिलकर राजाको समझाने-बुझाने लगे ॥ ५६ ॥

तथैवोत्थापयामासुर्गान्धारीं कुरुयोषितः ।

स दैवं परमं मत्वा भवितव्यं च पार्थिवः ॥ ५७ ॥

परां पीडां समाश्रित्य नष्टचित्तो महातपाः ।

चिन्ताशोकपरीतात्मा न जज्ञे मोहपीडितः ।

स समाश्वासितो राजा तूष्णीमासीद् विचेतनः ॥ ५८ ॥

इसी प्रकार कुरुकुलकी स्त्रियोंने आकर गान्धारी देवीको उठाया। भाग्य और

भवितव्यताको ही प्रबल मानकर राजा धृतराष्ट्र भारी व्यथाका अनुभव करने लगे। उनकी

विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। वे महातपस्वी नरेश चिन्ता और शोकमें डूब गये और मोहसे

पीड़ित होनेके कारण उन्हें किसी भी बातकी सुध न रही। विदुर और संजयके समझानेपर

राजा धृतराष्ट्र अचेत-से होकर चुपचाप बैठे रह गये ॥ ५७-५८ ॥

श्रवणमहिमा

इमं महायुद्धमखं महात्मनो-

र्धनंजयस्याधिरथेश्च यः पठेत् ।

स सम्यगिष्टस्य मखस्य यत् फलं

तदाप्नुयात् संश्रवणाच्च भारत ॥ ५९ ॥

भारत! जो मनुष्य महात्मा अर्जुन और कर्णके इस महायुद्धरूपी यज्ञका पाठ अथवा

श्रवण करेगा, वह विधिपूर्वक किये हुए यज्ञानुष्ठानका फल प्राप्त कर लेगा ॥ ५९ ॥

मखो हि विष्णुर्भगवान् सनातनो

वदन्ति तच्चाग्न्यनिलेन्दुभानवः ।

अतोऽनसूयुः शृणुयात् पठेच्च यः

स सर्वलोकानुचरः सुखी भवेत् ॥ ६० ॥

सनातन भगवान् विष्णु यज्ञस्वरूप हैं, इस बातको अग्नि, वायु, चन्द्रमा और सूर्य भी

कहते हैं। अतः जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इस युद्धयज्ञका वर्णन पढ़ता या