महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2439, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमध्यप्राप्तांस्तथा श्रुत्वा हृष्ट आसं तदानघ ॥ ७ ॥
निष्पाप संजय! जब मैं यह सुनता था कि मेरे बच्चे बाल्यावस्थाको लाँघकर युवावस्थामें प्रविष्ट हुए हैं और धीरे-धीरे मध्य अवस्थातक पहुँच गये हैं, तब हर्षसे फूल उठता था ॥ ७ ॥
तानद्य निहतान् श्रुत्वा हतैश्वर्यान् हतौजसः ।
न लभेयं क्वचिच्छान्तिं पुत्राधिभिरभिप्लुतः ॥ ८ ॥
आज उन्हीं पुत्रोंको ऐश्वर्य और बलसे हीन एवं मारा गया सुनकर उनकी चिन्तासे व्यथित हो कहीं भी शान्ति नहीं पा रहा हूँ ॥ ८ ॥
एह्येहि पुत्र राजेन्द्र ममानाथास्य साम्प्रतम् ।
त्वया हीनो महाबाहो कां नु यास्याम्यहं गतिम् ॥ ९ ॥
(इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र इस प्रकार विलाप करने लगे—) बेटा! राजाधिराज! इस समय मुझ अनाथके पास आओ, आओ। महाबाहो! तुम्हारे बिना न जाने मैं किस दशाको पहुँच जाऊँगा? ॥ ९ ॥
कथं त्वं पृथिवीपालांस्त्यक्त्वा तात समागतान् ।
शेषे विनिहतो भूमौ प्राकृतः कुन्नृपो यथा ॥ १० ॥
तात! तुम यहाँ पधारे हुए समस्त भूमिपालोंको छोड़कर किसी नीच और दुष्ट राजाके समान मारे जाकर पृथ्वीपर कैसे सो रहे हो? ॥ १० ॥
गतिर्भूत्वा महाराज ज्ञातीनां सुहृदां तथा ।
अन्धं वृद्धं च मां वीर विहाय क्व नु यास्यसि ॥ ११ ॥
वीर महाराज! तुम भाई-बन्धुओं और सुहृदोंके आश्रय होकर भी मुझ अंधे और बूढ़ेको छोड़कर कहाँ चले जा रहे हो? ॥ ११ ॥
सा कृपा सा च ते प्रीतिः क्व सा राजन् सुमानिता ।
कथं विनिहतः पार्थैः संयुगेष्वपराजितः ॥ १२ ॥
राजन्! तुम्हारी वह कृपा, वह प्रीति और दूसरोंको सम्मान देनेकी वह वृत्ति कहाँ चली गयी? तुम तो किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे; फिर कुन्तीके पुत्रोंके द्वारा युद्धमें कैसे मारे गये? ॥ १२ ॥
को नु मामुत्थितं वीर तात तातेति वक्ष्यति ।
महाराजेति सततं लोकनाथेति चासकृत् ॥ १३ ॥
वीर! अब मेरे उठनेपर मुझे सदा तात, महाराज और लोकनाथ आदि बारंबार कहकर कौन पुकारेगा? ॥ १३ ॥
परिष्वज्य च मां कण्ठे स्नेहेन क्लिन्नलोचनः ।
अनुशाधीति कौरव्य तत् साधु वद मे वचः ॥ १४ ॥