महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2458, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयं समाश्रित्य युद्ध्यन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।। ८ ।। 'राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है, जिसका आश्रय लेकर क्षत्रिय लोग युद्धमें तत्पर रहते हैं।। ८ ।। पुत्रो भ्राता पिता चैव स्वस्त्रीयो मातुलस्तथा । सम्बन्धिबान्धवाश्चैव योद्धव्या वै क्षत्रजीविना ।। ९ ।। 'क्षत्रियधर्मसे जीवन-निर्वाह करनेवाले पुरुषके लिये पुत्र, भ्राता, पिता, भानजा, मामा, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव—इन सबके साथ युद्ध करना कर्तव्य है ।। ९ ।। वधे चैव परो धर्मस्तथाधर्मः पलायने । ते स्म घोरां समापन्ना जीविकां जीवितार्थिनः ।। १० ।। 'युद्धमें शत्रुको मारना या उसके हाथसे मारा जाना दोनों ही उत्तम धर्म है और युद्धसे भागनेपर महान् पाप होता है। सभी क्षत्रिय जीवन-निर्वाहकी इच्छा रखते हुए उसी घोर जीविकाका आश्रय लेते हैं ।। १० ।। तदत्र प्रतिवक्ष्यामि किंचिदेव हितं वचः । हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णे चैव महारथे ।। ११ ।। जयद्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ । लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे ।। १२ ।। 'ऐसी दशामें मैं यहाँ तुम्हारे लिये कुछ हितकी बात बताऊँगा। अनघ! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महारथी कर्ण, जयद्रथ तथा तुम्हारे सभी भाई मारे जा चुके हैं। तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण भी जीवित नहीं है। अब दूसरा कौन बच गया है, जिसका हमलोग आश्रय ग्रहण करें ।। ११-१२ ।। येषु भारं समासाद्य राज्ये मतिमकुर्महि । ते संत्यज्य तनूर्याताः शूरा ब्रह्मविदां गतिम् ।। १३ ।। 'जिनपर युद्धका भार रखकर हम राज्य पानेकी आशा करते थे, वे शूरवीर तो शरीर छोड़कर ब्रह्मवेत्ताओंकी गतिको प्राप्त हो गये ।। १३ ।। वयं त्विह विना भूता गुणवद्भिर्महारथैः । कृपणं वर्तयिष्याम पातयित्वा नृपान् बहून् ।। १४ ।। 'इस समय हमलोग यहाँ भीष्म आदि गुणवान् महारथियोंके सहयोगसे वंचित हो गये हैं और बहुत-से नरेशोंको मरवाकर दयनीय स्थितिमें आ गये हैं ।। १४ ।। सर्वैरथ च जीवद्भिर्बीभत्सुरपराजितः । कृष्णनेत्रो महाबाहुर्देवैरपि दुरासदः ।। १५ ।। 'जब सब लोग जीवित थे, तब भी अर्जुन किसीके द्वारा पराजित नहीं हुए। श्रीकृष्ण-जैसे नेताके रहते हुए महाबाहु अर्जुन देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं ।। १५ ।। इन्द्रकार्मुकतुल्याभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम् ।