महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोऽर्करश्मिनिभांस्तीक्ष्णांस्तोमरान् वै चतुर्दश । अप्रेषयत् सव्यसाची द्विधैककमथाच्छिनत् ॥ ७ ॥ भगदत्तने सूर्यकी किरणोंके समान तीखे चौदह तोमर चलाये, परंतु सव्यसाची अर्जुनने उनमेंसे प्रत्येकके दो-दो टुकड़े कर डाले ॥ ७ ॥
ततो नागस्य तद् वर्म व्यधमत् पाकशासनिः । शरजालेन महता तद् व्यशीर्यत भूतले ॥ ८ ॥ तब इन्द्रकुमारने भारी बाण-वर्षाके द्वारा उस हाथीके कवचको काट डाला, जिससे कवच जीर्ण-शीर्ण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८ ॥
शीर्णवर्मा स तु गजः शरैः सुभृशमर्दितः । बभौ धारानिपाताक्तो व्यभ्रः पर्वतराडिव ॥ ९ ॥ कवच कट जानेपर हाथीको बाणोंके आघातसे बड़ी पीड़ा होने लगी। वह खूनकी धारासे नहा उठा और बादलोंसे रहित एवं (गैरिकमिश्रित) जलधारासे भीगे हुए गिरिराजके समान शोभा पाने लगा ॥ ९ ॥
ततः प्राग्ज्योतिषः शक्तिं हेमदण्डामयस्मयीम् । व्यसृजद् वासुदेवाय द्विधा तामर्जुनोऽच्छिनत् ॥ १० ॥ तब भगदत्तने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको लक्ष्य करके सुवर्णमय दण्डसे युक्त लोहमयी शक्ति चलायी। परंतु अर्जुनने उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ १० ॥
ततश्छत्रं ध्वजं चैव छित्त्वा राज्ञोऽर्जुनः शरैः । विव्याध दशभिस्तूर्णमुत्स्मयन् पर्वतेश्वरम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा राजा भगदत्तके छत्र और ध्वजको काटकर मुसकराते हुए दस बाणोंद्वारा तुरंत ही उन पर्वतेश्वरको बींध डाला ॥ ११ ॥
सोऽतिविद्धोऽर्जुनशरैः सुपुङ्खैः कङ्कपत्रिभिः । भगदत्तस्ततः क्रुद्धः पाण्डवस्य जनाधिपः ॥ १२ ॥ अर्जुनके कंकपत्रयुक्त सुन्दर पाँखोंवाले बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हो राजा भगदत्त उन पाण्डुपुत्रपर कुपित हो उठे ॥ १२ ॥
व्यसृजत् तोमरान् मूर्ध्नि श्वेताश्वस्योन्ननाद च । तैरर्जुनस्य समरे किरीटं परिवर्तितम् ॥ १३ ॥ उन्होंने श्वेतवाहन अर्जुनके मस्तकपर तोमरोंका प्रहार किया और जोरसे गर्जना की। उन तोमरोंने समरभूमिमें अर्जुनके किरीटको उलट दिया ॥ १३ ॥
परिवृत्तं किरीटं तद् यमयन्नेव पाण्डवः । सुदृष्टः क्रियतां लोक इति राजानमब्रवीत् ॥ १४ ॥ उलटे हुए किरीटको ठीक करते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनने भगदत्तसे कहा—'राजन्! अब इस संसारको अच्छी तरह देख लो' ॥ १४ ॥