महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2464, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः
दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना
संजय उवाच
एवमुक्तस्ततो राजा गौतमेन तपस्विना ।
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च तूष्णीमासीद् विशाम्पते ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! तपस्वी कृपाचार्यके ऐसा कहनेपर दुर्योधन जोर-जोरसे गरम साँस खींचता हुआ कुछ देरतक चुपचाप बैठा रहा ॥ १ ॥
ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा धार्तराष्ट्रो महामनाः ।
कृपं शारद्वतं वाक्यमित्युवाच परंतपः ॥ २ ॥
दो घड़ीतक सोच-विचार करनेके पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके उस महामनस्वी पुत्रने शरदद्वान्के पुत्र कृपाचार्यको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २ ॥
यत् किंचित् सुहृदा वाच्यं तत् सर्वं श्रावितो ह्यहम् ।
कृतं च भवता सर्वं प्राणान् संत्यज्य युध्यता ॥ ३ ॥
‘विप्रवर! एक हितैषी सुहृद्को जो कुछ कहना चाहिये, वह सब आपने कह सुनाया। इतना ही नहीं, आपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हुए मेरी भलाईके लिये सब कुछ किया है ॥ ३ ॥
गाहमानमनीकानि युध्यमानं महारथैः ।
पाण्डवैरतितेजोभिर्लोकस्त्वामनुदृष्टवान् ॥ ४ ॥
‘सब लोगोंने आपको शत्रुओंकी सेनाओंमें घुसते और अत्यन्त तेजस्वी महारथी पाण्डवोंके साथ युद्ध करते हुए बारंबार देखा है ॥ ४ ॥
सुहृदा यदिदं वाक्यं भवता श्रावितो ह्यहम् ।
न मां प्रीणाति तत् सर्वं मुमूर्षोरिव भेषजम् ॥ ५ ॥
‘आप मेरे हितचिन्तक सुहृद् हैं तो भी आपने मुझे जो बात सुनायी है, वह सब मेरे मनको उसी तरह पसंद नहीं आती, जैसे मरणासन्न रोगीको दवा अच्छी नहीं लगती है ॥ ५ ॥
हेतुकारणसंयुक्तं हितं वचनमुत्तमम् ।
उच्यमानं महाबाहो न मे विप्राग्र्य रोचते ॥ ६ ॥
‘महाबाहो! विप्रवर! आपने युक्ति और कारणोंसे सुसंगत, हितकारक एवं उत्तम बात कही है तो भी वह मुझे अच्छी नहीं लग रही है ॥ ६ ॥