भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2516

निवार्यमाणो बहुभिर्द्रौपद्याः प्रियमास्थितः । तथा जिसके द्वारा क्रोधमें भरे हुए महाबलवान् कुन्तीकुमार भीमने बहुतोंके मना करनेपर भी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हो गर्जना करते हुए कुबेरभवनमें रहनेवाले बहुत-से मायामय अभिमानी गुह्यकोंका वध किया था ।। ५६ १/२ ।। तां वज्रमणिरत्नौघकल्मषां वज्रगौरवाम् ।। ५७ ।। समुद्यम्य महाबाहुः शल्यमभ्यपतद् रणे । जिसमें वज्रकी गुरुता भरी है और जो हीरे, मणि तथा रत्नसमूहोंसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करती है, उसीको हाथमें उठाकर महाबाहु भीमसेन रणभूमिमें शल्यपर टूट पड़े ।। ५७ १/२ ।। गदया युद्धकुशलस्तया दारुणनादया ।। ५८ ।। पोथयामास शल्यस्य चतुरोऽश्वान् महाजवान् । युद्धकुशल भीमसेनने भयंकर शब्द करनेवाली उस गदाके द्वारा शल्यके महान् वेगशाली चारों घोड़ोंको मार गिराया ।। ५८ १/२ ।। ततः शल्यो रणे क्रुद्धः पीने वक्षसि तोमरम् ।। ५९ ।। निचखान नदन् वीरो वर्म भित्त्वा च सोऽभ्ययात् । तब रणभूमिमें कुपित हो गर्जना करते हुए वीर शल्यने भीमसेनके विशाल वक्षःस्थलमें एक तोमर धँसा दिया। वह उनके कवचको छेदकर छातीमें गड़ गया ।। वृकोदरस्त्वसम्भ्रान्तस्तमेवोद्धृत्य तोमरम् ।। ६० ।। यन्तारं मद्रराजस्य निर्बिभेद ततो हृदि । इससे भीमसेनको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने उसी तोमरको निकालकर उसके द्वारा मद्रराज शल्यके सारथिकी छाती छेद डाली ।। ६० १/२ ।। स भिन्नमर्मा रुधिरं वमन् वित्रस्तमानसः ।। ६१ ।। पपाताभिमुखो दीनो मद्रराजस्त्वपाक्रमत् । इससे सारथिका मर्मस्थल विदीर्ण हो गया और वह मुँहसे रक्त वमन करता हुआ दीन एवं भयभीतचित्त होकर शल्यके सामने ही रथसे नीचे गिर पड़ा। फिर तो मद्रराज शल्य वहाँसे पीछे हट गये ।। ६१ १/२ ।। कृतप्रतिकृतं दृष्ट्वा शल्यो विस्मितमानसः ।। ६२ ।। गदामाश्रित्य धर्मात्मा प्रत्यमित्रमैक्षत । अपने प्रहारका भरपूर उत्तर प्राप्त हुआ देख धर्मात्मा शल्यका चित्त आश्चर्यसे चकित हो उठा। वे गदा हाथमें लेकर अपने शत्रु की ओर देखने लगे ।। ६२ १/२ ।। ततः सुमनसः पार्था भीमसेनमपूजयन् । ते दृष्ट्वा कर्म संग्रामे घोरमक्लिष्टकर्मणः ।। ६३ ।।

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