भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2520

लगे ।। १४ ।। तौ गदाभिहतैर्गात्रैः क्षणेन रुधिरोक्षितौ । प्रेक्षणीयतरावास्तां पुष्पिताविव किंशुकौ ।। १५ ।। उन दोनोंके अंगोंमें गदाकी गहरी चोटोंसे घाव हो गये थे। अतः दोनों ही क्षणभरमें खूनसे नहा गये। उस समय खिले हुए दो पलाशवृक्षोंके समान वे दोनों वीर देखने ही योग्य जान पड़ते थे ।। १५ ।।

गदया मद्रराजस्य सव्यदक्षिणमाहतः । भीमसेनो महाबाहुर्न चचालाचलो तथा ।। १६ ।। मद्रराजकी गदासे दायें-बायें अच्छी तरह चोट खाकर भी महाबाहु भीमसेन विचलित नहीं हुए। वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे ।। १६ ।।

तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो मुहुर्मुहुः । शल्यो न विव्यथे राजन् दन्तिनेव महागिरिः ।। १७ ।। इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे बारंबार आहत होनेपर भी शल्यको उसी प्रकार व्यथा नहीं हुई, जैसे दन्तार हाथीके आघातसे महान् पर्वत पीड़ित नहीं होता ।। १७ ।।

शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयोः पुरुषसिंहयोः । गदानिपातसंहादो वज्रयोरिव निःस्वनः ।। १८ ।। उस समय उन दोनों पुरुषसिंहोंकी गदाओंके टकरानेकी आवाज सम्पूर्ण दिशाओंमें दो वज्रोंके आघातके समान सुनायी देती थी ।। १८ ।।

निवृत्य तु महावीर्यौ समुच्छ्रितमहागदौ । पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतुः ।। १९ ।। महापराक्रमी भीमसेन और शल्य दोनों वीर अपनी विशाल गदाओंको ऊपर उठाये कभी पीछे लौट पड़ते, कभी मध्यम मार्गमें स्थित होते और कभी मण्डलाकार घूमने लगते थे ।। १९ ।।

अथाभ्येत्य पदान्यष्टौ संनिपातोऽभवत् तयोः । उद्यम्य लोहदण्डाभ्यामतिमानुषकर्मणोः ।। २० ।। वे युद्ध करते-करते आठ कदम आगे बढ़ आये और लोहेके डंडे उठाकर एक-दूसरेको मारने लगे। उनका पराक्रम अलौकिक था। उन दोनोंमें उस समय भयानक संघर्ष होने लगा ।। २० ।।

पोथयन्तौ तदान्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः । क्रियाविशेषं कृतिनौ दर्शयामासतुस्तदा ।। २१ ।। वे दोनों युद्धकलाके विद्वान् वीर, एक-दूसरेको कुचलते हुए मण्डलाकार विचरते और अपना-अपना विशेष कार्य-कौशल प्रदर्शित करते थे ।। २१ ।।

अथोद्यम्य गदे घोरे सशृङ्गाविव पर्वतौ ।