महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2549, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब मद्रराजके द्वारा इस प्रकार पाण्डव-सैनिकोंका संहार होने लगा, तब पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर अमर्षके वशीभूत हो गये ।। १४ ।। ततः पौरुषमास्थाय मद्रराजमताडयत् । जयो वास्तु वधो वास्तु कृतबुद्धिर्महारथः ॥ १५ ॥ तदनन्तर उन्होंने अपने पुरुषार्थका आश्रय ले मद्रराजपर प्रहार आरम्भ किया। महारथी युधिष्ठिरने यह निश्चय कर लिया कि आज या तो मेरी विजय होगी अथवा मेरा वध हो जायगा ।। १५ ।। समाहूयाब्रवीत् सर्वान् भ्रातॄन् कृष्णं च माधवम् । भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च ये चान्ये पृथिवीक्षितः ॥ १६ ॥ कौरवार्थे पराक्रान्ताः संग्रामे निधनं गताः । यथाभागं यथोत्साहं भवन्तः कृतपौरुषाः ॥ १७ ॥ उन्होंने अपने समस्त भाइयों तथा श्रीकृष्ण और सात्यकिको बुलाकर इस प्रकार कहा—'बन्धुओ! भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा अन्य जो-जो राजा दुर्योधनके लिये पराक्रम दिखाते थे, वे सब-के-सब संग्राममें मारे गये। तुमलोगोंने पुरुषार्थ करके उत्साहपूर्वक अपने-अपने हिस्सेका कार्य पूरा कर लिया ।। १६-१७ ।। भागोऽवशिष्ट एकोऽयं मम शल्यो महारथः । सोऽहमद्य युधा जेतुमाशंसे मद्रकाधिपम् ॥ १८ ॥ 'अब एकमात्र महारथी शल्य शेष रह गये हैं, जो मेरे हिस्सेमें पड़ गये हैं। अतः आज मैं इन मद्रराज शल्यको युद्धमें जीतनेकी आशा करता हूँ ।। १८ ।। तत्र यन्मानसं मह्यं तत् सर्वं निगदामि वः । चक्ररक्षाविमौ वीरौ मम माद्रवतीसुतौ ॥ १९ ॥ अजेयौ वासवेनापि समरे शूरसम्मतौ । 'इसके सम्बन्धमें मेरे मनमें जो संकल्प है, वह सब तुम लोगोंसे बता रहा हूँ, सुनो। जो समरांगणमें इन्द्रके लिये भी अजेय तथा शूरवीरोंद्वारा सम्मानित हैं, वे दोनों माद्रीकुमार वीर नकुल और सहदेव मेरे रथके पहियोंकी रक्षा करें ।। १९ १/२ ।। साध्विमौ मातुलं युद्धे क्षत्रधर्मपुरस्कृतौ ॥ २० ॥ मदर्थे प्रतियुद्ध्येतां मानार्हौ सत्यसङ्गरौ । मां वा शल्यो रणे हन्ता तं वाहं भद्रमस्तु वः ॥ २१ ॥ 'क्षत्रिय-धर्मको सामने रखते हुए ये सम्मान पानेके योग्य सत्यप्रतिज्ञ नकुल और सहदेव मेरे लिये समरांगणमें अपने मामाके साथ अच्छी तरह युद्ध करें। फिर या तो शल्य रणभूमिमें मुझे मार डालें या मैं उनका वध कर डालूँ। आप लोगोंका कल्याण हो ।। २०-२१ ।। इति सत्यामिमां वाणीं लोकवीरा निबोधत ।