भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2555, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2555

धनुश्चास्य शिताग्रेण बाणेन निरकृन्तत । युद्ध करते समय युधिष्ठिरके लिये सब कुछ प्रदक्षिण (अनुकूल) हो रहा था। तदनन्तर शल्यने युधिष्ठिरपर सौ बाणोंका प्रहार किया तथा तीखी धारवाले बाणसे उनके धनुषको भी काट दिया ।। ६१ १/२ ।। सोऽन्यत् कार्मुकमादाय शल्यं शरशतैस्त्रिभिः ।। ६२ ।। अविध्यत् कार्मुकं चास्य क्षुरेण निरकृन्तत । अथास्य निजघानाश्वांश्चतुरो नतपर्वभिः ।। ६३ ।। द्वाभ्यामतिशिताग्राभ्यामुभौ तत् पार्ष्णिसारथी । ततोऽस्य दीप्यमानेन पीतेन निशितेन च ।। ६४ ।। प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरद् ध्वजम् । ततः प्रभग्नं तत् सैन्यं दौर्योधनमरिंदम ।। ६५ ।। तब युधिष्ठिरने दूसरा धनुष लेकर शल्यको तीन सौ बाणोंसे घायल कर दिया और एक क्षुरके द्वारा उनके धनुषके भी दो टुकड़े कर दिये। इसके बाद झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको मार डाला। फिर दो अत्यन्त तीखे बाणोंसे दोनों पार्श्वरक्षकोंको यमलोक भेज दिया। तदनन्तर एक चमकते हुए पानीदार पैने भल्लसे सामने खड़े हुए शल्यके ध्वजको भी काट गिराया। शत्रुदमन नरेश! फिर तो दुर्योधनकी वह सेना वहाँसे भाग खड़ी हुई ।। ततो मद्राधिपं द्रौणिर्भ्यधावत् तथा कृतम् । आरोप्य चैनं स्वरथे त्वरमाणः प्रदुद्रुवे ।। ६६ ।। उस समय मद्रराज शल्यकी ऐसी अवस्था हुई देख अश्वत्थामा दौड़ा और उन्हें अपने रथपर बिठाकर तुरंत वहाँ-से भाग गया ।। ६६ ।। मुहूर्तमिव तौ गत्वा नर्दमाने युधिष्ठिरे । स्मित्वा ततो मद्रपतिरन्यं स्यन्दनमास्थितः ।। ६७ ।। विधिवत् कल्पितं शुभ्रं महाम्बुदनिनादिनम् । सज्जयन्त्रोपकरणं द्विषतां लोमहर्षणम् ।। ६८ ।। युधिष्ठिर दो घड़ीतक उनका पीछा करके सिंहके समान दहाड़ते रहे। तत्पश्चात् मद्रराज शल्य मुसकराकर दूसरे रथपर जा बैठे। उनका वह उज्ज्वल रथ विधिपूर्वक सजाया गया था। उससे महान् मेघके समान गम्भीर ध्वनि होती थी। उसमें यन्त्र आदि आवश्यक उपकरण सजाकर रख दिये गये थे और वह रथ शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। ६७-६८ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शल्ययुधिष्ठिरयुद्धे षोडशोऽध्यायः ।। १६ ।।