भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2563

कुन्तीपुत्रकी ओर दौड़े। उन्होंने नकुलके रथका हरसा काटकर युधिष्ठिरपर धावा किया॥ २९-३०॥

तं चापि राजानमथोत्पतन्तं क्रुद्धं यथैवान्तकमापतन्तम्। धृष्टद्युम्नो द्रौपदेयाः शिखण्डी शिनेश्च नप्ता सहसा परीयुः॥ ३१॥

क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान उछलकर आनेवाले राजा शल्यको धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र, शिखण्डी तथा सात्यकिने सहसा चारों ओरसे घेर लिया॥ ३१॥

अथास्य चर्माप्रतिमं न्यकृन्तद् भीमो महात्मा नवभिः पृषत्कैः। खड्गं च भल्लैर्निचकर्त मुष्टौ नदन् प्रहृष्टस्तव सैन्यमध्ये॥ ३२॥

महामना भीमने नौ बाणोंसे उनकी अनुपम ढालके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर आपकी सेनाके बीचमें बड़े हर्षके साथ गर्जना करते हुए उन्होंने अनेक भल्लोंद्वारा उनकी तलवारकी मुट्ठी भी काट डाली॥ ३२॥

तत् कर्म भीमस्य समीक्ष्य हृष्टा- स्ते पाण्डवानां प्रवरा रथौघाः। नादं च चक्रुर्भृशमुत्स्मयन्तः शङ्खांश्च दध्मुः शशिसंनिकाशान्॥ ३३॥

भीमसेनका यह अद्भुत कर्म देखकर पाण्डवदलके श्रेष्ठ रथी बड़े प्रसन्न हुए और वे हँसते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करने तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल शंख बजाने लगे॥ ३३॥

तेनाथ शब्देन विभीषणेन तथाभितप्तं बलमप्रधृष्यम्। कांदिग्भूतं रुधिरेणोक्षिताङ्गं विसंज्ञकल्पं च तदा विषण्णम्॥ ३४॥

उस भयानक शब्दसे संतप्त हो अजेय कौरवसेना विषादग्रस्त एवं अचेत-सी हो गयी। वह खूनसे लथपथ हो अज्ञात दिशाओंकी ओर भागने लगी॥ ३४॥

स मद्रराजः सहसा विकीर्णो भीमाग्रगैः पाण्डवयोधमुख्यैः। युधिष्ठिरस्याभिमुखं जवेन सिंहो यथा मृगहेतोः प्रयाततः॥ ३५॥