महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2566, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंईशानहेतोः प्रतिनिर्मितां तां त्वष्ट्रा रिपूणामसुदेहभक्ष्याम्। भूम्यन्तरिक्षादिजलाशयानि प्रसह्य भूतानि निहन्तुमीशाम्॥ ४५॥ त्वष्टा प्रजापति (विश्वकर्मा)-ने भगवान् शंकरके लिये उस शक्तिका निर्माण किया था। वह शत्रुओंके प्राण और शरीरको अपना ग्रास बना लेनेवाली थी तथा जल, थल एवं आकाश आदिमें रहनेवाले प्राणियोंको भी बलपूर्वक मार डालनेमें समर्थ थी॥ ४५॥
घण्टापताकामणिवज्रभाजं वैदूर्यचित्रां तपनीयदण्डाम्। त्वष्ट्रा प्रयत्नान्नियमेन क्लृप्तां ब्रह्मद्विषामन्तकरीममोघाम्॥ ४६॥ उसमें छोटी-छोटी घंटियाँ और पताकाएँ लगी थीं, मणि और हीरे जड़े गये थे, वैदूर्यमणिके द्वारा उसे चित्रित किया गया था। उस शक्तिका दण्ड तपाये हुए सुवर्णका बना था। विश्वकर्माने नियमपूर्वक रहकर बड़े प्रयत्नसे उसको बनाया था। वह ब्रह्मद्रोहियोंका विनाश करनेवाली तथा लक्ष्य वेधनेमें अचूक थी॥ ४६॥
बलप्रयत्नादधिरूढवेगां मन्त्रैश्च घोरैरभिमन्त्र्य यत्नात्। ससर्ज मार्गेण च तां परेण वधाय मद्राधिपतेस्तदानीम्॥ ४७॥ बल और प्रयत्नके द्वारा उसका वेग बहुत बढ़ गया था, युधिष्ठिरने उस समय मद्रराजका वध करनेके लिये उसे घोर मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके उत्तम मार्गके द्वारा प्रयत्नपूर्वक छोड़ा था॥ ४७॥
हतोऽसि पापेत्यभिगर्जमानो रुद्रोऽन्धकायान्तकरं यथेषुम्। प्रसार्य बाहुं सुदृढं सुपाणिं क्रोधेन नृत्यन्निव धर्मराजः॥ ४८॥ जैसे रुद्रने अन्धकासुरपर प्राणान्तकारी बाण छोड़ा था, उसी प्रकार क्रोधसे नृत्य-सा करते हुए धर्मराज युधिष्ठिरने सुन्दर हाथवाली अपनी सुदृढ़ बाँह फैलाकर वह शक्ति शल्यपर चला दी और गरजते हुए कहा—‘ओ पापी! तू मारा गया’॥ ४८॥
(स्फुरत्प्रभामण्डलमंशुजालै- र्धर्मात्मनो मद्रविनाशकाले। पुरत्रयप्रोत्सरणे पुरस्ता- न्माहेश्वरं रूपमभूत् तदानीम्॥)