भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2573

तब महारथी राजा युधिष्ठिरने बड़ी उतावलीके साथ चार बाण मारकर कृतवर्माके चारों घोड़ोंका संहार कर डाला तथा छः तेज धारवाले भल्लोंसे कृपाचार्यको भी घायल कर दिया ।। ८५-८६ ।।

अश्वत्थामा ततो राज्ञा हताश्वं विरथीकृतम् । तमपवाह हार्दक्यं स्वरथेन युधिष्ठिरात् ।। ८७ ।। इसके बाद अश्वत्थामा अपने रथके द्वारा घोड़ोंके मारे जानेसे रथहीन हुए कृतवर्माको राजा युधिष्ठिरके पाससे दूर हटा ले गया ।। ८७ ।।

ततः शारद्वतः षड्भिः प्रत्यविध्यद् युधिष्ठिरम् । विव्याध चाश्वांस्त्रिशितैस्तस्याष्टाभिः शिलीमुखैः ।। ८८ ।। तब कृपाचार्यने छः बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको बींध डाला और आठ पैने बाणोंसे उनके घोड़ोंको भी घायल कर दिया ।। ८८ ।।

एवमेतन्महाराज युद्धशेषमवर्तत । तव दुर्मन्त्रिते राजन् सह पुत्रस्य भारत ।। ८९ ।। महाराज! भरतवंशी नरेश! इस प्रकार पुत्रसहित आपकी कुमन्त्रणासे इस युद्धका अन्त हुआ ।। ८९ ।।

तस्मिन् महेष्वासवरे विशस्ते संग्राममध्ये कुरुपुङ्गवेन । पार्थाः समेताः परमप्रहृष्टाः शङ्खान् प्रदध्मुर्हतमीक्ष्य शल्यम् ।। ९० ।। कुरुकुलशिरोमणि युधिष्ठिरके द्वारा युद्धमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर शल्यके मारे जानेपर कुन्तीके सभी पुत्र एकत्र हो अत्यन्त हर्षमें भर गये और शल्यको मारा गया देख शंख बजाने लगे ।। ९० ।।

युधिष्ठिरं च प्रशशंसुराजौ पुरा कृते वृत्रवधे यथेन्द्रम् । चक्रुश्च नानाविधवाद्यशब्दान् निनादयन्तो वसुधां समेताः ।। ९१ ।। जैसे पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध करनेपर देवताओंने इन्द्रकी स्तुति की थी, उसी प्रकार सब पाण्डवोंने रणभूमिमें युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए वे सब लोग नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि फैलाने लगे ।। ९१ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शल्यवधे सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शल्यका वधविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७ ।।