महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2579, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंरथैर्भग्नैर्युगाक्षैश्च निहतैश्च महारथैः ॥ ३१ ॥ अश्वैर्निपतितैश्चैव संछन्नाभूद् वसुन्धरा । टूटे-फूटे रथों, जूओं और धुरोंसे, मारे गये महारथियोंसे तथा धराशायी हुए घोड़ोंसे भूमि ढक गयी थी ॥ ३१ १/२ ॥ वातायमानैस्तुरगैर्युगासक्तैस्ततस्ततः ॥ ३२ ॥ अदृश्यन्त महाराज योधास्तत्र रणाजिरे । महाराज! वहाँ समरांगणमें बहुत-से योद्धा जूएमें बँधे हुए वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा इधर-उधर ले जाये जाते दिखायी देते थे ॥ ३२ १/२ ॥ भग्नचक्रान् रथान् केचिदहरंस्तुरगा रणे ॥ ३३ ॥ रथार्धं केचिदादाय दिशो दश विबभ्रमुः । कुछ घोड़े रणभूमिमें टूटे पहियोंवाले रथोंको लिये जा रहे थे और कितने ही अश्व आधे ही रथको लेकर दसों दिशाओंमें चक्कर लगाते थे ॥ ३३ १/२ ॥ तत्र तत्र व्यदृश्यन्त योक्तैः श्लिष्टाः स्म वाजिनः ॥ ३४ ॥ रथिनः पतमानाश्च दृश्यने स्म नरोत्तमाः । गगनात् प्रच्युताः सिद्धाः पुण्यानामिव संक्षये ॥ ३५ ॥ जहाँ-तहाँ जोतोंसे जुड़े हुए घोड़े और नरश्रेष्ठ रथी गिरते दिखायी दे रहे थे, मानो सिद्ध (पुण्यात्मा) पुरुष पुण्यक्षय होनेपर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हों ॥ निहतेषु च शूरेषु मद्रराजानुगेषु वै । अस्मानापततश्चापि दृष्ट्वा पार्था महारथाः ॥ ३६ ॥ अभ्यवर्तन्त वेगेन जयगृद्धाः प्रहारिणः । बाणशब्दरवान् कृत्वा विमिश्रान् शङ्खनिःस्वनैः ॥ ३७ ॥ मद्रराजके उन शूरवीर सैनिकोंके मारे जानेपर हमें आक्रमण करते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले महारथी पाण्डवयोद्धा शंखध्वनिके साथ बाणोंकी सनसनाहट फैलाते हुए हमारा सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आये ॥ ३६-३७ ॥ अस्मांस्तु पुनरासाद्य लब्धलक्ष्यप्रहारिणः । शरासनानि धुन्वानाः सिंहनादान् प्रचुक्रुशुः ॥ ३८ ॥ हमारे पास पहुँचकर लक्ष्य वेधनेमें सफल और प्रहारकुशल पाण्डव-सैनिक अपने धनुष हिलाते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ३८ ॥ ततो हतमभिप्रेक्ष्य मद्रराजबलं महत् । मद्रराजं च समरे दृष्ट्वा शूरं निपातितम् ॥ ३९ ॥ दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत् पराङ्मुखम् । मद्रराजकी वह विशाल सेना मारी गयी तथा शूरवीर मद्रराज शल्य पहले ही समरभूमिमें धराशायी किये जा चुके हैं, यह सब अपनी आँखों देखकर दुर्योधनकी सारी