महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2582, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतद् भयं स च नः शोको भय एवाभ्यवर्तत ।
भारत! प्रजानाथ! भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके योद्धाओंको जो दुःख और भय प्राप्त हुआ था, वही भय और वही शोक पुनः (शल्यके मारे जानेपर) हमारे सामने उपस्थित हुआ ।। ६ १/२ ।।
निराशाश्च जये तस्मिन् हते शल्ये महारथे ॥ ७ ॥
हतप्रवीरा विध्वस्ता निकृत्ताश्च शितैः शरैः ।
जिनके प्रमुख वीर मारे गये थे, वे कौरवसैनिक महारथी शल्यका वध हो जानेपर पैने बाणोंसे क्षत-विक्षत और विध्वस्त हो विजयकी ओरसे निराश हो गये थे ।। ७ १/२ ।।
मद्रराजे हते राजन् योधास्ते प्राद्रवन् भयात् ॥ ८ ॥
अश्वानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथाः ।
आरुह्य जवसम्पन्नाः पादाताः प्राद्रवंस्तथा ॥ ९ ॥
राजन्! मद्रराजकी मृत्यु हो जानेपर आपके वे सभी योद्धा भयके मारे भागने लगे। कुछ सैनिक घोड़ोंपर, कुछ हाथियोंपर और दूसरे महारथी रथोंपर आरूढ़ हो बड़े वेगसे भागे। पैदल सैनिक भी वहाँसे भाग खड़े हुए ।।
द्विसाहस्राश्च मातङ्गा गिरिरूपाः प्रहारिणः ।
सम्प्राद्रवन् हते शल्ये अङ्कुशाङ्गुष्ठनोदिताः ॥ १० ॥
दो हजार प्रहारकुशल पर्वताकार मतवाले हाथी शल्यके मारे जानेपर अंकुशों और पैरके अँगूठोंसे प्रेरित हो तीव्र गतिसे पलायन करने लगे ।। १० ।।
ते रणाद् भरतश्रेष्ठ तावकाः प्राद्रवन् दिशः ।
धावतश्चाप्यपश्याम श्वसमानान् शराहतान् ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! आपके वे सैनिक रणभूमिसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागे थे। हमने देखा, वे बाणोंसे क्षत-विक्षत हो हाँफते हुए दौड़े जा रहे हैं ।। ११ ।।
तान् प्रभग्नान् द्रुतान् दृष्ट्वा हतोत्साहान् पराजितान् ।
अभ्यवर्तन्त पञ्चालाः पाण्डवाश्च जयैषिणः ॥ १२ ॥
उन्हें हतोत्साह, पराजित एवं हताश होकर भागते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले पांचाल और पाण्डव उनका पीछा करने लगे ।। १२ ।।
बाणशब्दरवाश्चापि सिंहनादाश्च पुष्कलाः ।
शङ्खशब्दश्च शूराणां दारुणः समपद्यत ॥ १३ ॥
बाणोंकी सनसनाहट, शूरवीरोंका सिंहनाद और शंखध्वनि—इन सबकी मिली-जुली आवाज बड़ी भयानक जान पड़ती थी ।। १३ ।।
दृष्ट्वा तु कौरवं सैन्यं भयत्रस्तं प्रविद्रुतम् ।
अन्योन्यं सम्भाषन्त पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ १४ ॥