महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2590, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्युद्ययुस्तदा पार्था जयगृद्धाः प्रमन्यवः । उनके आक्रमण करते ही अपनी सेनाका व्यूह बनाकर प्रहारकुशल, विजयाभिलाषी तथा बढ़े हुए क्रोधवाले पाण्डव शीघ्र ही उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ६७ १/३ ॥ धनंजयो रथेनाजौ व्यभ्यवर्तत वीर्यवान् ॥ ६८ ॥ विश्रुतं त्रिषु लोकेषु व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः । पराक्रमी अर्जुन अपने त्रिलोकविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए रथके द्वारा युद्धके लिये वहाँ आ पहुँचे ॥ ६८ १/३ ॥ माद्रीपुत्रौ च शकुनिं सात्यकिश्च महाबलः ॥ ६९ ॥ जवेनाभ्यपतन् हृष्टा यत्ता वै तावकं बलम् ॥ ७० ॥ माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव और महाबली सात्यकिने शकुनिपर धावा किया। ये सब लोग हर्ष और उत्साहमें भरकर बड़ी सावधानीके साथ आपकी सेनापर वेगपूर्वक टूट पड़े ॥ ६९-७० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ७१ श्लोक हैं।)