महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2592, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः शरान् वै सृजतो महारणे योधांश्च राजन् नयतो यमालयम् ।। ५ ।। नास्यान्तरं ददृशुः स्वे परे वा यथा पुरा वज्रधरस्य दैत्याः । ऐरावणस्थस्य चमूविमर्दे- दैत्याः पुरा वासवस्येव राजन् ।। ६ ।। राजन्! जैसे पूर्वकालमें ऐरावतपर बैठकर शत्रु-सेनाका संहार करते हुए वज्रधारी इन्द्रके बाण छोड़ने और विपक्षीको मार गिरानेके अन्तरको दैत्य और देवता नहीं देख पाते थे, उसी प्रकार उस महासमरमें शाल्वके बाण छोड़ने तथा सैनिकोंको यमलोक पहुँचानेमें कितनी देर लगती है, इसे अपने या शत्रुपक्षके योद्धा नहीं देख सके ।। ते पाण्डवाः सोमकाः सृञ्जयाश्च तमेकनागं ददृशुः समन्तात् । सहस्रशो वै विचरन्तमेकं यथा महेन्द्रस्य गजं समीपे ।। ७ ।। इन्द्रके ऐरावत हाथीकी भाँति म्लेच्छराजका वह गजराज यद्यपि रणभूमिमें अकेला ही निकट विचर रहा था, तो भी पाण्डव, सृंजय और सोमकयोद्धा उसे सहस्रोंकी संख्यामें देखते थे। उन्हें सब ओर वही वह दिखायी देता था ।। ७ ।। संद्राव्यमाणं तु बलं परेषां परीतकल्पं विबभौ समन्ततः । नैवावतस्थे समरे भृशं भयाद् विमृद्यमानं तु परस्परं तदा ।। ८ ।। उस हाथीके द्वारा खदेड़ी जाती हुई वह सेना सब ओरसे घिरी हुई-सी जान पड़ती थी। अत्यन्त भयके कारण वह समरभूमिमें ठहर न सकी। उस समय सभी सैनिक आपसमें ही धक्के खाकर कुचले जाने लगे ।। ८ ।। ततः प्रभग्ना सहसा महाचमूः सा पाण्डवी तेन नराधिपेन । दिशश्चतस्रः सहसा विधाविता गजेन्द्रवेगं तमपारयन्ती ।। ९ ।। दृष्ट्वा च तां वेगवतीं प्रभग्नां सर्वे त्वदीया युधि योधमुख्याः । अपूजयंस्ते तु नराधिपं तं दध्मुश्च शङ्खान् शशिसंनिकाशान् ।। १० ।।