भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2595

तस्याभितो व्यापततो गजस्य । स संगृहीतो रथिभिर्गजो वै चचाल तैवार्यमाणश्च संख्ये ।। २० ।। उन रथियोंने सब ओर आक्रमण करनेवाले उस हाथीके वेगको सहसा अपने बाणोंद्वारा अवरुद्ध कर दिया। उनके द्वारा अपनी प्रगति रुक जानेके कारण वह निगृहीत-सा होकर विचलित हो उठा ।। २० ।।

ततः पृषत्कान् प्रववर्ष राजा सूर्यो यथा रश्मिजालं समन्तात् । तैराशुगैर्वध्यमाना रथौघाः प्रदुद्रुवुः सहितास्तत्र तत्र ।। २१ ।। तदनन्तर जैसे सूर्यदेव सब ओर अपनी किरणोंका प्रसार करते हैं, उसी प्रकार राजा शाल्वने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। उन शीघ्रगामी बाणोंकी मार खाकर वे पाण्डव रथी एक साथ इधर-उधर भागने लगे ।। २१ ।।

तत् कर्म शाल्वस्य समीक्ष्य सर्वे पाञ्चालपुत्रा नृप सृञ्जयाश्च । हाहाकारैर्नादयन्ति स्म युद्धे द्विपं समन्ताद् रुरुधुर्नराग्र्याः ।। २२ ।। नरेश्वर! शास्त्रका वह पराक्रम देखकर समस्त नरश्रेष्ठ पांचाल तथा सृंजय अपने हाहाकारोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे। उन्होंने युद्धभूमिमें उस हाथीको चारों ओरसे घेर लिया ।। २२ ।।

पाञ्चालपुत्रस्त्वरितस्तु शूरो गदां प्रगृह्याचलशृङ्गकल्पाम् । ससम्भ्रमं भारत शत्रुघाती जवेन वीरोऽनुससार नागम् ।। २३ ।। भारत! इसी समय शत्रुघाती शूरवीर पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने तुरंत ही पर्वतशिखरके समान विशाल गदा हाथमें लेकर बड़े वेगसे उस हाथीपर आक्रमण किया ।।

ततस्तु नागं धरणीधराभं मदं स्रवन्तं जलदप्रकाशम् । गदां समाविद्धय भृशं जघान पाञ्चालराजस्य सुतस्तरस्वी ।। २४ ।। पांचालराजके वेगवान् पुत्रने मेघोंके समान मदकी वर्षा करनेवाले उस पर्वताकार गजराजपर अपनी गदा घुमाकर बड़े वेगसे प्रहार किया ।। २४ ।।

स भिन्नकुम्भः सहसा विनद्य