महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2616, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतकुलभूषण नरेश! उस समय सब ओर गिरते हुए प्रासोंका स्वरूप आकाशमें छाये हुए टिड्डीदलोंके समान जान पड़ता था ॥ ४७ ॥ रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा विप्रविद्धैर्नियन्तृभिः । हयाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४८ ॥ सैकड़ों और हजारों घोड़े अपने घायल सवारोंके साथ सारे अंगोंमें लहूलुहान होकर धरतीपर गिर रहे थे ॥ अन्योन्यं परिपिष्टाश्च समासाद्य परस्परम् । आविक्षताः स्म दृश्यन्ते वमन्तो रुधिरं मुखैः ॥ ४९ ॥ बहुत-से सैनिक परस्पर टकराकर एक-दूसरेसे पिस जाते और क्षत-विक्षत हो मुखोंसे रक्त वमन करते हुए दिखायी देते थे ॥ ४९ ॥ ततोऽभवत्तमो घोरं सैन्येन रजसा वृते । तानपाक्रमतोऽद्राक्षं तस्माद् देशादरिंदम ॥ ५० ॥ शत्रुदमन नरेश! तत्पश्चात् जब सेनाद्वारा उठी हुई धूलसे सब ओर घोर अन्धकार छा गया, उस समय हमने देखा कि बहुत-से योद्धा वहाँसे भागे जा रहे हैं ॥ ५० ॥ अश्वान् राजन् मनुष्यांश्च रजसा संवृते सति । भूमौ निपतितांश्चान्ये वमन्तो रुधिरं बहु ॥ ५१ ॥ राजन्! धूलसे सारा रणक्षेत्र भर जानेके कारण अँधेरेमें बहुत-से घोड़ों और मनुष्योंको भी हमने भागते देखा था। कितने ही योद्धा पृथ्वीपर गिरकर मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन कर रहे थे ॥ ५१ ॥ केशाकेशि समालग्ना न शेकुश्चेष्टितुं नराः । अन्योन्यमश्वपृष्ठेभ्यो विकर्षन्तो महाबलाः ॥ ५२ ॥ बहुत-से मनुष्य परस्पर केश पकड़कर इतने सट गये थे कि कोई चेष्टा नहीं कर पाते थे। कितने ही महाबली योद्धा एक-दूसरेको घोड़ोंकी पीठोंसे खींच रहे थे ॥ ५२ ॥ मल्ला इव समासाद्य निजघ्नुरितरेतरम् । अश्वैश्च व्यपकृष्यन्त बहवोऽत्र गतासवः ॥ ५३ ॥ बहुत-से सैनिक पहलवानोंकी भाँति परस्पर भिड़कर एक-दूसरेपर चोट करते थे। कितने ही प्राणशून्य होकर अश्वोंद्वारा इधर-उधर घसीटे जा रहे थे ॥ ५३ ॥ भूमौ निपतितांश्चान्ये बहवो विजयैषिणः । तत्र तत्र व्यदृश्यन्त पुरुषाः शूरमानिनः ॥ ५४ ॥ बहुतेरे विजयाभिलाषी तथा अपनेको शूरवीर माननेवाले पुरुष जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर पड़े दिखायी देते थे ॥ रक्तोक्षितैश्छिन्नभुजैरवकृष्टशिरोरुहैः । व्यदृश्यत मही कीर्णा शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५५ ॥