महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2622, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार
संजय उवाच
तस्मिन् शब्दे मृदौ जाते पाण्डवैर्निहते बले।
अश्वैः सप्तशतैः शिष्टैरूपावर्तत सौबलः॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जब पाण्डवयोध्दाओंने अधिकांश सेनाका संहार कर डाला और युद्धका कोलाहल कम हो गया, तब सुबलपुत्र शकुनि शेष बचे हुए सात सौ घुड़सवारोंके साथ कौरव-सेनाके समीप चला गया॥ १॥
स यात्वा वाहिनीं तूर्णमब्रवीत् त्वरयन् युधि।
युध्यध्वमिति संहृष्टाः पुनः पुनररिंदमाः॥ २ ॥
अपृच्छत् क्षत्रियांस्तत्र क्व नु राजा महाबलः।
वह तुरंत कौरव-सेनामें पहुँचकर सबको युद्धके लिये शीघ्रता करनेकी प्रेरणा देता हुआ बोला—'शत्रुओंका दमन करनेवाले वीरो! तुम हर्ष और उत्साहके साथ युद्ध करो।' ऐसा कहकर उसने वहाँ बारंबार क्षत्रियोंसे पूछा—'महाबली राजा दुर्योधन कहाँ है?'॥ २ १/२॥
शकुनेस्तद् वचः श्रुत्वा तमूचुर्भरतर्षभ॥ ३ ॥
असौ तिष्ठति कौरव्यो रणमध्ये महाबलः।
यत्रैतत् सुमहच्छत्रं पूर्णचन्द्रसमप्रभम्॥ ४ ॥
यत्र ते सतनूत्राणा रथास्तिष्ठन्ति दंशिताः।
भरतश्रेष्ठ! शकुनिकी वह बात सुनकर उन क्षत्रियोंने उसे यह उत्तर दिया—'प्रभो! महाबली कुरुराज रणक्षेत्रके मध्यभागमें वहाँ खड़े हैं, जहाँ यह पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् विशाल छत्र तना हुआ है तथा जहाँ वे शरीर-रक्षक आवरणों एवं कवचोंसे सुसज्जित रथ खड़े हैं॥
यत्रैष तुमुलः शब्दः पर्जन्यनिनदोपमः॥ ५ ॥
तत्र गच्छ द्रुतं राजंस्ततो द्रक्ष्यसि कौरवम्।
'राजन्! जहाँ यह मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान भयानक शब्द गूँज रहा है, वहीं शीघ्रतापूर्वक चले जाइये, वहाँ आप कुरुराजका दर्शन कर सकेंगे'॥ ५ १/२॥
एवमुक्तस्तु तैर्योधैः शकुनिः सौबलस्तदा॥ ६ ॥
प्रययौ तत्र यत्रासौ पुत्रस्तव नराधिप।
सर्वतः संवृतो वीरैः समरे चित्रयोधिभिः॥ ७ ॥