महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर तो जैसे बादल पानीकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन युद्धस्थलमें सैकड़ों पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए रथके द्वारा आगे बढ़े। उस समय झुकी हुई गाँठवाले बाणोंका महान् शब्द प्रकट होने लगा ।। ५५१/२ ।। इषुभिश्छाद्यमानानां समरे सव्यसाचिना ।। ५६ ।। असज्जन्तस्तनुत्रेषु शरौघाः प्रापतन् भुवि । सव्यसाची अर्जुनद्वारा समरभूमिमें बाणोंसे आच्छादित होनेवाले सैनिकोंके कवचोंपर उनके बाण अटकते नहीं थे। वे चोट करके पृथ्वीपर गिर जाते थे ।। ५६१/२ ।। इन्द्राशनिसमस्पर्शा गाण्डीवप्रेषिताः शराः ।। ५७ ।। नरान् नागान् समाहत्य हयांश्चापि विशाम्पते । अपतन्त रणे बाणाः पतङ्गा इव घोषिणः ।। ५८ ।। प्रजानाथ! इन्द्रके वज्रकी भाँति कठोर स्पर्शवाले बाण गाण्डीवसे प्रेरित हो मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंका भी संहार करके शब्द करनेवाले टिड्डीदलोंके समान रणभूमिमें गिर पड़ते थे ।। ५८ ।। आसीत् सर्वमवच्छन्नं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः । न प्राज्ञायन्त समरे दिशो वा प्रदिशोऽपि वा ।। ५९ ।। गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उस रणभूमिकी सारी वस्तुएँ आच्छादित हो गयी थीं। दिशाओं अथवा विदिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो पाता था ।। ५९ ।। सर्वमासीज्जगत् पूर्णं पार्थनामाङ्कितैः शरैः । रुक्मपुङ्खैस्तैलधौतैः कर्मारपरिमार्जितैः ।। ६० ।। अर्जुनके नामसे अंकित, तेलके धोये और कारीगरके साफ किये सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा वहाँका सारा जगत् व्याप्त हो रथा था ।। ६० ।। ते दह्यमानाः पार्थेन पावकेनेव कुञ्जराः । पार्थं न प्रजहुर्घोरा वध्यमानाः शितैः शरैः ।। ६१ ।। दावानलके आगसे जलनेवाले हाथियोंके समान पार्थके पैने बाणोंकी मार खाकर दग्ध होते हुए वे घोर कौरवयোদ্ধा अर्जुनको छोड़कर हटते नहीं थे ।। ६१ ।। शरचापधरः पार्थः प्रज्वलन्निव भास्करः । ददाह समरे योधान् कक्षमनिरिव ज्वलन् ।। ६२ ।। जैसे जलती हुई आग घास-फूसके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले धनुष-बाणधारी अर्जुनने समरांगणमें आपके योद्धाओंको दग्ध कर दिया ।। ६२ ।। यथा वनान्ते वनपैर्विसृष्टः कक्षं दहेत् कृष्णगतिः सुघोषः । भूरिद्रुमं शुष्कलतातवितानं