महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2635, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमतवाले हाथीके समान पराक्रमी बलवान् भीमसेन उन गजराजोंको आते देख तुरंत ही रथसे कूदकर हाथमें विशाल गदा लिये दण्डधारी यमराजके समान उनपर टूट पड़े ॥ ३० १/२ ॥
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथम् ॥ ३१ ॥ वित्रेसुस्तावकाः सैन्याः शकृन्मूत्रे च सुस्रुवुः । पाण्डव-महारथी भीमसेनको गदा उठाये देख आपके सैनिक भयसे थर्रा उठे और मल-मूत्र करने लगे ॥ ३१ १/२ ॥
आविग्नं च बलं सर्वं गदाहस्ते वृकोदरे ॥ ३२ ॥ गदया भीमसेनेन भिन्नकुम्भान् रजस्वलान् । धावमानानपश्याम कुञ्जरान् पर्वतोपमान् ॥ ३३ ॥ भीमसेनके गदा हाथमें लेते ही सारी कौरवसेना उद्विग्न हो उठी। हमने देखा, भीमसेनकी गदासे उन धूलिधूसर पर्वताकार हाथियोंके कुम्भस्थल फट गये हैं और वे इधर-उधर भाग रहे हैं ॥ ३२-३३ ॥
प्राद्रवन् कुञ्जरास्ते तु भीमसेनगदाहताः । पेतुरार्तस्वरं कृत्वा छिन्नपक्षा इवाद्रयः ॥ ३४ ॥ भीमसेनकी गदासे घायल हो वे हाथी भाग चले और आर्तनाद करके पंख कटे हुए पर्वतोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥
प्रभिन्नकुम्भांस्तु बहून् द्रवमाणानितस्ततः । पतमानांश्च सम्प्रेक्ष्य वित्रेसुस्तव सैनिकाः ॥ ३५ ॥ कुम्भस्थल फट जानेके कारण इधर-उधर भागते और गिरते हुए बहुत-से हाथियोंको देखकर आपके सैनिक संत्रस्त हो उठे ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिरोऽपि संक्रुद्धो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । गार्ध्रपत्रैः शितैर्बाणैर्निन्युर्वै यमसादनम् ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर तथा माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव भी अत्यन्त कुपित हो गीधकी पाँखोंसे युक्त पैने बाणोंद्वारा उन हाथियोंको यमलोक भेजने लगे ॥ ३६ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु समरे पराजित्य नराधिपम् । अपक्रान्ते तव सुते हयपृष्ठं समाश्रिते ॥ ३७ ॥ दृष्ट्वा च पाण्डवान् सर्वान् कुञ्जरैः परिवारितान् । धृष्टद्युम्नो महाराज सहसा समुपाद्रवत् ॥ ३८ ॥ पुत्रः पाञ्चालराजस्य जिघांसुः कुञ्जरान् ययौ ।