महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2656, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः क्रुद्धो रणे भीमः सहदेवश्च भारत । चेरतुः कदनं संख्ये कुर्वन्तौ सुमहाबलौ ॥ ७ ॥ भारत! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए भीमसेन और सहदेव दोनों महाबली वीर युद्धस्थलमें भीषण संहार मचाते हुए विचरने लगे ॥ ७ ॥
ताभ्यां शरशतैश्छन्नं तद् बलं तव भारत । सान्धकारमिवाकाशमभवत् तत्र तत्र ह ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! उन दोनोंके सैकड़ों बाणोंसे ढकी हुई आपकी सेना जहाँ-तहाँ अन्धकारपूर्ण आकाशके समान प्रतीत होती थी ॥ ८ ॥
अश्वैर्विपरिधावद्भिः शरच्छन्नैर्विशाम्पते । तत्र तत्र वृतो मार्गो विकर्षद्भिर्हतान् बहून् ॥ ९ ॥ प्रजानाथ! बाणोंसे ढके हुए भागते घोड़ोंने, जो बहुत-से मरे हुए वीरोंको अपने साथ इधर-उधर खींचे लिये जाते थे, यत्र-तत्र जानेका मार्ग अवरुद्ध कर दिया ॥ ९ ॥
निहतानां हयानां च सहैव हयसादिभिः । वर्मभिर्विनिकृत्तैश्च प्रासैश्छिन्नैश्च मारिष ॥ १० ॥ ऋष्टिभिः शक्तिभिश्चैव सासिप्रासपरश्वधैः । संछन्ना पृथिवी जज्ञे कुसुमैः शबला इव ॥ ११ ॥ मान्यवर नरेश! घुड़सवारोंसहित मारे गये घोड़ोंके शरीरों, कटे हुए कवचों, टूक-टूक हुए प्रासों, ऋष्टियों, शक्तियों, खड्गों, भालों और फरसोंसे ढकी हुई पृथ्वी बहुरंगी फूलोंसे आच्छादित हो चितकबरी हुई-सी जान पड़ती थी ॥ १०-११ ॥
योधास्तत्र महाराज समासाद्य परस्परम् । व्यचरन्त रणे क्रुद्धा विनिघ्नन्तः परस्परम् ॥ १२ ॥ महाराज! वहाँ रणभूमिमें कुपित हुए योद्धा एक-दूसरेसे भिड़कर परस्पर चोट करते हुए घूम रहे थे ॥
उद्वृत्तनयनै रोषात् संदष्टौष्ठपुटैर्मुखैः । सकुण्डलैर्मही च्छन्ना पद्मकिञ्जल्कसंनिभैः ॥ १३ ॥ कमलकेसरकी-सी कान्तिवाले कुण्डलमण्डित कटे हुए मस्तकोंसे यह पृथ्वी ढक गयी थी। उनकी आँखें घूर रही थीं और उन्होंने रोषके कारण अपने ओठोंको दाँतोंसे दबा रखा था ॥ १३ ॥
भुजैश्छिन्नैर्महाराज नागराजकरोपमैः । साङ्गदैः सतनूत्रैश्च सासिप्रासपरश्वधैः ॥ १४ ॥ कबन्धरुत्थितैश्छिन्नैर्नृत्यद्भिश्चापरैर्युधि । क्रव्यादगणसंछन्ना घोराभूत् पृथिवी विभो ॥ १५ ॥