भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2658

एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सौबलस्य पदानुगाः ॥ २३ ॥ पाण्डवानभ्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् । राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर सुबलपुत्र शकुनिके पीछे चलनेवाले सैनिक 'अब हमें मृत्यु ही युद्धसे लौटा सकती है' ऐसा संकल्प लेकर पुनः पाण्डवोंपर टूट पड़े ॥ २३ ॥ द्रवद्भिस्तत्र राजेन्द्र कृतः शब्दोऽतिदारुणः ॥ २४ ॥ क्षुब्धसागरसंकाशाः क्षुभिताः सर्वतोऽभवन् । राजेन्द्र! वहाँ धावा करते समय उन सैनिकोंने बड़ा भयंकर कोलाहल मचाया। वे विक्षुब्ध समुद्रके समान क्षोभमें भरकर सब ओर छा गये ॥ २४ १/२ ॥ तांस्तथा पुरतो दृष्ट्वा सौबलस्य पदानुगान् ॥ २५ ॥ प्रत्युद्ययुर्महाराज पाण्डवा विजयोद्यताः । महाराज! शकुनिके सेवकोंको इस प्रकार सामने आया देख विजयके लिये उद्यत हुए पाण्डव वीर आगे बढ़े ॥ २५ १/२ ॥ प्रत्याश्वस्य च दुर्धर्षः सहदेवो विशाम्पते ॥ २६ ॥ शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा हयांश्चास्य त्रिभिः शरैः । धनुश्चिच्छेद च शरैः सौबलस्य हसन्निव ॥ २७ ॥ प्रजानाथ! इतनेहीमें स्वस्थ होकर दुर्धर्ष वीर सहदेवने हँसते हुए-से दस बाणोंसे शकुनिको बींध डाला और तीन बाणोंसे उसके घोड़ोंको मारकर हँसते हुए-से अनेक बाणोंद्वारा सुबलपुत्रके धनुषको भी टूक-टूक कर डाला ॥ २६-२७ ॥ अथान्यद् धनुरादाय शकुनिर्युद्धदुर्दमः । विव्याध नकुलं षष्ट्या भीमसेनं च सप्तभिः ॥ २८ ॥ तदनन्तर दूसरा धनुष हाथमें लेकर रणदुर्मद शकुनिने नकुलको साठ और भीमसेनको सात बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २८ ॥ उलूकोऽपि महाराज भीमं विव्याध सप्तभिः । सहदेवं च सप्तत्या परीप्सन् पितरं रणे ॥ २९ ॥ महाराज! रणभूमिमें पिताकी रक्षा करते हुए उलूकने भीमसेनको सात और सहदेवको सत्तर बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २९ ॥ तं भीमसेनः समरे विव्याध नवभिः शरैः । शकुनिं च चतुःषष्ट्या पार्श्वस्थांश्च त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ३० ॥ तब भीमसेनने समरांगणमें नौ बाणोंसे उलूकको, चौसठ बाणोंसे शकुनिको और तीन-तीन बाणोंसे उसके पाश्र्वरक्षकोंको भी घायल कर दिया ॥ ३० ॥ ते हन्यमाना भीमेन नाराचैस्तैलपायितैः । सहदेवं रणे क्रुद्धाश्छादयन् शरवृष्टिभिः ॥ ३१ ॥ पर्वतं वारिधाराभिः सविद्युत इवाम्बुदाः ।