महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2663, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशरेण कार्तस्वरभूषितेन दिवाकराभेण सुसंहितेन । हृतोत्तमाङ्गो युधि पाण्डवेन पपात भूमौ सुबलस्य पुत्रः ॥ ६२ ॥ वह सुवर्णभूषित बाण सूर्यके समान तेजस्वी तथा अच्छी तरह संधान करके चलाया गया था। उसके द्वारा पाण्डुकुमार सहदेवने युद्धस्थलमें जब सुबलपुत्र शकुनिका मस्तक काट डाला, तब वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६२ ॥
स तच्छिरो वेगवता शरेण सुवर्णपुङ्खेन शिलाशितेन । प्रावेरयत् कुपितः पाण्डुपुत्रो यत्तत् कुरूणामनयस्य मूलम् ॥ ६३ ॥ क्रोधमें भरे हुए पाण्डुपुत्र सहदेवने शिलापर तेज किये हुए और सुवर्णमय पंखवाले वेगवान् बाणसे शकुनिके उस मस्तकको काट गिराया, जो कौरवोंके अन्यायका मूल कारण था ॥ ६३ ॥
भुजौ सुवृत्तौ प्रचकर्त वीरः पश्चात् कबन्धं रुधिरावसिक्तम् । विस्पन्दमानं निपपात घोरं रथोत्तमात् पार्थिव पार्थिवस्य ॥ ६४ ॥ राजन्! वीर सहदेवने जब उसकी गोल-गोल सुन्दर दोनों भुजाएँ काट दीं, उसके पश्चात् राजा शकुनिका भयंकर धड़ लहुलुहान होकर श्रेष्ठ रथसे नीचे गिर पड़ा और छटपटाने लगा ॥ ६४ ॥
हृतोत्तमाङ्गं शकुनिं समीक्ष्य भूमौ शयानं रुधिरार्द्रगात्रम् । योधास्त्वदीया भयनष्टसत्त्वा दिशः प्रजग्मुः प्रगृहीतशस्त्राः ॥ ६५ ॥ शकुनिको मस्तकसे रहित एवं खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देख आपके योद्धा भयके कारण अपना धैर्य खो बैठे और हथियार लिये हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ६५ ॥
प्रविद्रुताः शुष्कमुखा विसंज्ञा गाण्डीवघोषेण समाहताश्च । भयार्दिता भग्नरथाश्चनागाः पदातयश्चैव सधार्तराष्ट्राः ॥ ६६ ॥