महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमरनेसे बचे हुए वे तीनों रथी मुझे भी कृपाचार्यके सुसज्जित रथपर बिठाकर छावनीतक ले आये। सूर्य अस्ताचलपर जा चुके थे। वहाँ छावनीके पहरेदार भयसे घबराये हुए थे। आपके पुत्रोंके विनाशका समाचार सुनकर वे सभी फूट-फूटकर रोने लगे ।। ६३-६४ १/२ ।।
ततो वृद्धा महाराज योषितां रक्षिणो नराः ।। ६५ ।।
राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ।
महाराज! तदनन्तर स्त्रियोंकी रक्षामें नियुक्त हुए वृद्ध पुरुषोंने राजकुलकी महिलाओंको साथ लेकर नगरकी ओर प्रस्थान करनेकी तैयारी की ।। ६५ १/२ ।।
तत्र विक्रोशमानानां रुदतीनां च सर्वशः ।। ६६ ।।
प्रादुरासीन्महान् शब्दः श्रुत्वा तद् बलसंक्षयम् ।
ततस्ता योषितो राजन् क्रन्दन्त्यो वै मुहुर्मुहुः ।। ६७ ।।
कुरर्य इव शब्देन नादयन्त्यो महीतलम् ।
उस समय वहाँ अपने पतियोंको पुकारती और रोती-बिलखती हुई राजमहिलाओंका महान् आर्तनाद सब ओर गूँज उठा। राजन्! अपनी सेना और पतियोंके संहारका समाचार सुनकर वे राजकुलकी युवतियाँ अपने आर्तनादसे भूतलको प्रतिध्वनित करती हुई बारंबार कुररीकी भाँति विलाप करने लगीं ।। ६६-६७ १/२ ।।
आजघ्नुः करजैश्चापि पाणिभिश्च शिरांस्युत ।। ६८ ।।
लुलुचुश्च तदा केशान् क्रोशन्त्यस्तत्र तत्र ह ।
हाहाकारविनादिन्यो विनिघ्नन्त्य उरांसि च ।। ६९ ।।
शोचन्त्यस्तत्र रुरुदुः क्रन्दमाना विशाम्पते ।
वे जहाँ-तहाँ हाहाकार करती हुई अपने ऊपर नखोंसे आघात करने, हाथोंसे सिर और छाती पीटने तथा केश नोचने लगीं। प्रजानाथ! शोकमें डूबकर पतिको पुकारती हुई वे रानियाँ करुण स्वरसे क्रन्दन करने लगीं ।।
ततो दुर्योधनामात्याः साश्रुकण्ठा भृशातुराः ।। ७० ।।
राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ।
इससे दुर्योधनके मन्त्रियोंका गला भर आया और वे अत्यन्त व्याकुल हो राजमहिलाओंको साथ ले नगरकी ओर चल दिये ।। ७० १/२ ।।
वेत्रव्यासक्तहस्ताश्च द्वाराध्यक्षा विशाम्पते ।। ७१ ।।
शयनीयानि शुभ्राणि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च ।
समादाय ययुस्तूर्णं नगरं द्वाररक्षिणः ।। ७२ ।।
प्रजानाथ! उनके साथ हाथोंमें बेंतकी छड़ी लिये द्वारपाल भी चल रहे थे। रानियोंकी रक्षामें नियुक्त हुए सेवक शुभ्र एवं बहुमूल्य बिछौने लेकर शीघ्रतापूर्वक नगरकी ओर चलने लगे ।। ७१-७२ ।।