महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! मेरे और तुम्हारे दोनोंके जीते-जी हमारी विजयके विषयमें समस्त प्राणियोंको संदेह बना रहेगा।।
जीवितं तव दुष्प्रज्ञ मयि सम्प्रति वर्तते ।। ६९ ।।
जीवयेयमहं कामं न तु त्वं जीवितुं क्षमः ।
दुर्मते! इस समय तुम्हारा जीवन मेरे हाथमें है। मैं इच्छानुसार तुम्हें जीवनदान दे सकता हूँ; परंतु तुम स्वेच्छापूर्वक जीवित रहनेमें समर्थ नहीं हो ।। ६९½ ।।
दहने हि कृतो यत्नस्त्वयास्मासु विशेषतः ।। ७० ।।
आशीविषैर्विषैश्चापि जले चापि प्रवेशनैः ।
त्वया विनिकृता राजन् राज्यस्य हरणेन च ।। ७१ ।।
अप्रियाणां च वचनैर्द्रौपद्याः कर्षणेन च ।
एतस्मात् कारणात् पाप जीवितं ते न विद्यते ।। ७२ ।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ युध्यस्व युद्धे श्रेयो भविष्यति ।
याद है न, तुमने हमलोगोंको जला डालनेके लिये विशेष प्रयत्न किया था। भीमको विषधर सर्पोंसे डसवाया, विष खिलाकर उन्हें पानीमें डुबाया, हमलोगोंका राज्य छीनकर हमें अपने कपटजालका शिकार बनाया, द्रौपदीको कटु वचन सुनाये और उसके केश खींचे। पापी! इन सब कारणोंसे तुम्हारा जीवन नष्ट-सा हो चुका है। उठो-उठो, युद्ध करो; इसीसे तुम्हारा कल्याण होगा ।। ७०—७२½ ।।
एवं तु विविधा वाचो जययुक्ताः पुनः पुनः ।
कीर्तयन्ति स्म ते वीरास्तत्र तत्र जनाधिप ।। ७३ ।।
नरेश्वर! वे विजयी वीर पाण्डव इस प्रकार वहाँ बारंबार नाना प्रकारकी बातें कहने लगे ।। ७३ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वान्तर्गतगदापर्वणि सुयोधनयुधिष्ठिरसंवादे
एकत्रिंशोऽध्यायः ।। ३१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधन-युधिष्ठिरसंवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३१ ।।