महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2702, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'राजन्! मुझे न तो तुमसे, न कुन्तीके बेटे भीमसेनसे, न अर्जुनसे, न श्रीकृष्णसे अथवा पांचालोंसे ही कोई भय है। नकुल-सहदेव, सात्यकि तथा अन्य जो-जो तुम्हारे सैनिक हैं, उनसे भी मैं नहीं डरता। युद्धमें क्रोधपूर्वक स्थित होनेपर मैं अकेला ही तुम सब लोगोंको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा।। १४-१५।। धर्ममूला सतां कीर्तिर्मनुष्याणां जनाधिप। धर्मं चैवेह कीर्तिं च पालयन् प्रब्रवीम्यहम्।। १६।। 'नरेश्वर! साधु पुरुषोंकी कीर्तिका मूल कारण धर्म ही है। मैं यहाँ उस धर्म और कीर्तिका पालन करता हुआ ही यह बात कह रहा हूँ।। १६।। अहमुत्थाय सर्वान् वै प्रतियोत्स्यामि संयुगे। अनुगम्यागतान् सर्वानृतून् संवत्सरो यथा।। १७।। 'मैं उठकर रणभूमिमें एक-एक करके आये हुए तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा, ठीक उसी तरह, जैसे संवत्सर बारी-बारीसे आये हुए सम्पूर्ण ऋतुओंको ग्रहण करता है।। १७।। अद्य वः सरथान् साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन्। नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसंक्षये।। १८।। तेजसा नाशयिष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवाः। 'पाण्डवो! स्थिर होकर खड़े रहो। आज मैं अस्त्र-शस्त्र एवं रथसे हीन होकर भी घोड़ों और रथोंपर चढ़कर आये हुए तुम सब लोगोंको उसी तरह अपने तेजसे नष्ट कर दूँगा, जैसे रात्रिके अन्तमें सूर्यदेव सम्पूर्ण नक्षत्रोंको अपने तेजसे अदृश्य कर देते हैं।। १८ १/२।। अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां यशस्विनाम्।। १९।। बाह्लीकद्रोणभीष्माणां कर्णस्य च महात्मनः। जयद्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभयोः।। २०।। मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एव च। पुत्राणां भरतश्रेष्ठ शकुनेः सौबलस्य च।। २१।। मित्राणां सुहृदां चैव बान्धवानां तथैव च। आनृण्यमद्य गच्छामि हत्वा त्वां भ्रातृभिः सह।। २२।। एतावदुक्त्वा वचनं विरराम जनाधिपः। 'भरतश्रेष्ठ! आज मैं भाइयोंसहित तुम्हारा वध करके उन यशस्वी क्षत्रियोंके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। बाह्लीक, द्रोण, भीष्म, महामना कर्ण, शूरवीर जयद्रथ, भगदत्त, मद्रराजशल्य, भूरिश्रवा, सुबलकुमार शकुनि तथा पुत्रों, मित्रों, सुहृदों एवं बन्धु-बान्धवोंके ऋणसे भी उऋण हो जाऊँगा।' राजा दुर्योधन इतना कहकर चुप हो गया।। १९—२२ १/२।।
युधिष्ठिर उवाच