भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2706, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2706

देना चाहता हो ॥ ४५ ॥ त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा संदष्टदशनच्छदः । प्रत्युवाच ततस्तान् वै पाण्डवान् सह केशवान् ॥ ४६ ॥ उसने अपनी भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके दाँतोंसे ओठको दबाया और श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा ॥ ४६ ॥

दुर्योधन उवाच

अस्यावहासस्य फलं प्रतिभोक्ष्यथ पाण्डवाः । गमिष्यथ हताः सद्यः सपञ्चाला यमक्षयम् ॥ ४७ ॥ दुर्योधन बोला—पांचालो और पाण्डवो! इस उपहासका फल तुम्हें अभी भोगना पड़ेगा; मेरे हाथसे मारे जाकर तुम तत्काल यमलोकमें पहुँच जाओगे ॥ ४७ ॥

संजय उवाच

उत्थितश्च जलात् तस्मात् पुत्रो दुर्योधनस्तव । अतिष्ठत गदापाणी रुधिरेण समुक्षितः ॥ ४८ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! आपका पुत्र दुर्योधन उस जलसे निकलकर हाथमें गदा लिये खड़ा हो गया। वह रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ४८ ॥ तस्य शोणितदिग्धस्य सलिलेन समुक्षितम् । शरीरं स्म तदा भाति स्रवन्निव महीधरः ॥ ४९ ॥ उस समय खूनसे लथपथ हुए दुर्योधनका शरीर पानीसे भीगकर जलका स्रोत बहानेवाले पर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ ४९ ॥ तमुद्यतगदं वीरं मेनिरे तत्र पाण्डवाः । वैवस्वतमिव क्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम् ॥ ५० ॥ वहाँ हाथमें गदा उठाये हुए वीर दुर्योधनको पाण्डवोंने क्रोधमें भरे हुए यमराज तथा हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हुए रुद्रके समान समझा ॥ ५० ॥ स मेघनिनदो हर्षात्नर्दन्निव च गोवृषः । आजुहाव ततः पार्थान् गदया युधि वीर्यवान् ॥ ५१ ॥ उस पराक्रमी वीरने हँकड़ते हुए साँड़के समान मेघके तुल्य गम्भीर गर्जना करते हुए बड़े हर्षके साथ गदायुद्धके लिये पाण्डवोंको ललकारा ॥ ५१ ॥

दुर्योधन उवाच

एकैकेन च मां यूयामासीदत युधिष्ठिर । न ह्येको बहुभिर्न्याय्यो वीरो योधयितुं युधि ॥ ५२ ॥

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