भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2717

अद्य तेऽहं विनेष्यामि युद्धश्रद्धां वृकोदर ॥ ५२ ॥ **दुर्योधन बोला—**वृकोदर! बहुत बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? आज मेरे साथ भिड़ तो सही। मैं युद्धका तेरा सारा हौसला मिटा दूँगा ॥ ५२ ॥ किं न पश्यसि मां पाप गदायुद्धे व्यवस्थितम् । हिमवच्छिखराकारां प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ५३ ॥ पापी! क्या तू देखता नहीं कि मैं हिमालयके शिखरकी भाँति विशाल गदा हाथमें लेकर युद्धके लिये खड़ा हूँ ॥ ५३ ॥ गदिनं कोऽद्य मां पाप हन्तुमुत्सहते रिपुः । न्यायतो युध्यमानश्च देवेष्वपि पुरन्दरः ॥ ५४ ॥ ओ पापी! आज कौन ऐसा शत्रु है, जो मेरे हाथमें गदा रहते हुए भी मुझे मार सके। न्यायपूर्वक युद्ध करते हुए देवताओंके राजा इन्द्र भी मुझे परास्त नहीं कर सकते ॥ ५४ ॥ मा वृथा गर्ज कौन्तेय शारदाभ्रमिवाजलम् । दर्शयस्व बलं युद्धे यावत् तत् तेऽद्य विद्यते ॥ ५५ ॥ कुन्तीपुत्र! शरद्-ऋतुके निर्जल मेघकी भाँति व्यर्थ गर्जना न कर। आज तेरे पास जितना बल हो, वह सब युद्धमें दिखा ॥ ५५ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा पाण्डवाः सहसृञ्जयाः । सर्वे सम्पूजयामासुस्तद्वचो विजिगीषवः ॥ ५६ ॥ दुर्योधनका यह वचन सुनकर विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त पाण्डवों और सृञ्जयोंने भी उसकी बड़ी सराहना की ॥ ५६ ॥ उन्मत्तमिव मातङ्गं तलशब्देन मानवाः । भूयः संहर्षयामासू राजन् दुर्योधनं नृपम् ॥ ५७ ॥ राजन्! जैसे मतवाले हाथीको मनुष्य ताली बजाकर कुपित कर देते हैं, उसी प्रकार उन्होंने बारंबार ताल ठोककर राजा दुर्योधनके युद्धविषयक हर्ष और उत्साहको बढ़ाया ॥ ५७ ॥ बृंहन्ति कुञ्जरास्तत्र हया हेषन्ति चासकृत् । शस्त्राणि सम्प्रदीप्यन्ते पाण्डवानां जयैषिणाम् ॥ ५८ ॥ उस समय वहाँ विजयाभिलाषी पाण्डवोंके हाथी बारंबार चिग्घाड़ने और घोड़े हिनहिनाने लगे। साथ ही उनके अस्त्र-शस्त्र दीप्तिसे प्रकाशित हो उठे ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि भीमसेनदुर्योधनसंवादे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें भीमसेन और दुर्योधनका संवादविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥