भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2722

परिष्वज्य तदा रामः पाण्डवान् सहसृञ्जयान् । अपृच्छत् कुशलं सर्वान् पार्थिवांश्चामितौजसः ॥ १४ ॥ उस समय बलरामजीने पाण्डवों, सृंजयों तथा अमित बलशाली सम्पूर्ण भूपालोंको हृदयसे लगाकर उनका कुशल-मंगल पूछा ॥ १४ ॥

तथैव ते समासाद्य पप्रच्छुस्तमनामयम् । प्रत्यभ्यर्च्य हली सर्वान् क्षत्रियांश्च महात्मनः ॥ १५ ॥ कृत्वा कुशलसंयुक्तां संविदं च यथावयः । जनार्दनं सात्यकिं च प्रेम्णा स परिषस्वजे ॥ १६ ॥ उसी प्रकार वे राजा भी उनसे मिलकर उनके आरोग्यका समाचार पूछने लगे। हलधरने सम्पूर्ण महामनस्वी क्षत्रियोंका समादर करके अवस्थाके अनुसार क्रमशः उनसे कुशल-मंगलकी जिज्ञासा की और श्रीकृष्ण तथा सात्यकिको प्रेमपूर्वक छातीसे लगा लिया ॥

मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय कुशलं पर्यपृच्छत । तौ च तं विधिवद् राजन् पूजयामासतुर्गुरुम् ॥ १७ ॥ ब्रह्माणमिव देवेशमिन्द्रोपेन्द्रौ मुदान्वितौ । राजन्! इन दोनोंका मस्तक सूंघकर उन्होंने कुशल-समाचार पूछा और उन दोनोंने भी अपने गुरुजन बलरामजीका विधिपूर्वक पूजन किया। ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्र और उपेन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक देवेश्वर ब्रह्माजीकी पूजा की थी ॥ १७ १/२ ॥

ततोऽब्रवीद् धर्मसुतो रौहिणेयमरिंदमम् ॥ १८ ॥ इदं भ्रात्रोर्महायुद्धं पश्य रामेति भारत । भारत! तत्पश्चात् धर्मपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुदमन रोहिणीकुमारसे कहा—'बलरामजी! दोनों भाइयोंका यह महान् युद्ध देखिये' ॥ १८ १/२ ॥

तेषां मध्ये महाबाहुः श्रीमान् केशवपूर्वजः ॥ १९ ॥ न्यविशत् परमप्रीतः पूज्यमानो महारथैः । उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णके बड़े भ्राता महाबाहु बलवान् श्रीबलरामजी उन महारथियोंसे पूजित हो उनके बीचमें अत्यन्त प्रसन्न होकर बैठे ॥ १९ १/२ ॥

स बभौ राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः ॥ २० ॥ दिवीव नक्षत्रगणैः परिकीर्णो निशाकरः । राजाओंके मध्यभागमें बैठे हुए नीलाम्बरधारी गौरकान्ति बलरामजी आकाशमें नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ २० १/२ ॥

ततस्तयोः संनिपातस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ २१ ॥ आसीदन्तकरो राजन् वैरस्य तव पुत्रयोः ॥ २२ ॥ राजन्! तदनन्तर आपके उन दोनों पुत्रोंमें वैरका अन्त कर देनेवाला भयंकर एवं रोमांचकारी संग्राम होने लगा ॥ २१-२२ ॥