महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरौहिणेये गते शूरे पुष्येण मधुसूदनः ।। १५ ।।
पाण्डवेयान् पुरस्कृत्य ययावभिमुखः कुरून् ।
सात्यकिसहित भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंका पक्ष लिया। रोहिणीनन्दन शूरवीर बलरामजीके चले जानेपर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंको आगे करके पुष्यनक्षत्रमें कुरुक्षेत्रकी ओर प्रस्थान किया ।। १५ १/२ ।।
गच्छन्नेव पथिस्थस्तु रामः प्रेष्यानुवाच ह ।। १६ ।।
सम्भारांस्तीर्थयात्रायां सर्वोपकरणानि च ।
आनयध्वं द्वारकायामग्नीन् वै याजकांस्तथा ।। १७ ।।
यात्रा करते हुए बलरामजीने स्वयं मार्गमें ही रहकर अपने सेवकोंसे कहा—'तुमलोग शीघ्र ही द्वारका जाकर वहाँसे तीर्थयात्रामें काम आनेवाली सब सामग्री, समस्त आवश्यक उपकरण, अग्निहोत्रकी अग्नि तथा पुरोहितोंको ले आओ ।। १६-१७ ।।
सुवर्णं रजतं चैव धेनूर्वासांसि वाजिनः ।
कुञ्जरांश्च रथांश्चैव खरोष्ट्रं वाहनानि च ।। १८ ।।
क्षिप्रमानीयतां सर्वं तीर्थहेतोः परिच्छदम् ।
'सोना, चाँदी, दूध देनेवाली गायें, वस्त्र, घोड़े, हाथी, रथ, गदहा और ऊँट आदि वाहन एवं तीर्थोपयोगी सब सामान शीघ्र ले आओ ।। १८ १/२ ।।
प्रतिस्रोतः सरस्वत्या गच्छध्वं शीघ्रगामिनः ।। १९ ।।
ऋत्विजश्चानयध्वं वै शतशश्च द्विजर्षभान् ।
'शीघ्रगामी सेवको! तुम सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलो और सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको ले आओ' ।।
एवं संदिश्य तु प्रेष्यान् बलदेवो महाबलः ।। २० ।।
तीर्थयात्रां ययौ राजन् कुरूणां वैशसे तदा ।
सरस्वतीं प्रतिस्रोतः समन्तादभिजग्मिवान् ।। २१ ।।
ऋत्विग्भिश्च सुहृद्भिश्च तथान्यैर्द्विजसत्तमैः ।
रथैर्गजैस्तथाश्वैश्च प्रेष्यैश्च भरतर्षभ ।। २२ ।।
गोखरोष्ट्रप्रयुक्तैश्च यानैश्च बहुभिर्वृतः ।
राजन्! महाबली बलदेवजीने सेवकोंको ऐसी आज्ञा देकर उस समय कुरुक्षेत्रमें ही तीर्थयात्रा आरम्भ कर दी। भरतश्रेष्ठ! वे सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलकर उसके दोनों तटोंपर गये। उनके साथ ऋत्विज, सुहृद्, अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मण, रथ, हाथी, घोड़े और सेवक भी थे। बैल, गदहा और ऊँटोंसे जुते हुए बहुसंख्यक रथोंसे बलरामजी घिरे हुए थे ।। २०—२२ १/२ ।।
श्रान्तानां क्लान्तवपुषां शिशूनां विपुलायुषाम् ।। २३ ।।
देशे देशे तु देयानि दानानि विविधानि च ।