भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2729

इस प्रकार उदार वृत्तिवाले अनुपम प्रभावशाली महात्मा बलरामने सरस्वतीके श्रेष्ठ

तीर्थोंमें बहुत धन दान किया और क्रमशः यात्रा करते हुए वे कुरुक्षेत्रमें आये ।।

जनमेजय उवाच

सारस्वतानां तीर्थानां गुणोत्पत्तिं वदस्व मे ।

फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्मनिर्वृत्तिमेव च ।। ३८ ।।

यथाक्रमेण भगवंस्तीर्थानामनुपूर्वशः ।

ब्रह्मन् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे ।। ३९ ।।

जनमेजय बोले—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और मनुष्योंमें उत्तम ब्राह्मणदेव! अब आप मुझे

सरस्वती-तटवर्ती तीर्थोंके गुण, प्रभाव और उत्पत्तिकी कथा सुनाइये। भगवन्! क्रमशः उन

तीर्थोंके सेवनका फल और जिस कर्मसे वहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, उसका अनुष्ठान भी

बताइये, मेरे मनमें यह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ।। ३८-३९ ।।

वैशम्पायन उवाच

तीर्थानां च फलं राजन् गुणोत्पत्तिं च सर्वशः ।

मयोच्यमानं वै पुण्यं शृणु राजेन्द्र कृत्स्नशः ।। ४० ।।

वैशम्पायनजीने कहा—राजेन्द्र! मैं तुम्हें तीर्थोंके गुण, प्रभाव, उत्पत्ति तथा उनके

सेवनका पुण्य-फल बता रहा हूँ। वह सब तुम ध्यानसे सुनो ।। ४० ।।

पूर्वं महाराज यदुप्रवीर

ऋत्विक्सुहृद्विप्रगणैश्च सार्धम् ।

पुण्यं प्रभासं समुपाजगाम

यत्रोडुराड् यक्ष्मणा क्लिश्यमानः ।। ४१ ।।

विमुक्तशापः पुनराप्य तेजः

सर्वं जगद् भासयते नरेन्द्र ।

एवं तु तीर्थप्रवरं पृथिव्यां

प्रभासनात् तस्य ततः प्रभासः ।। ४२ ।।

महाराज! यदुकुलके प्रमुख वीर बलरामजी सबसे पहले ऋत्विजों, सुहृदों और

ब्राह्मणोंके साथ पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें गये, जहाँ राजयक्ष्मासे कष्ट पाते हुए चन्द्रमाको

शापसे छुटकारा मिला था। नरेन्द्र! वे वहीं पुनः अपना तेज प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को

प्रकाशित करते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाको प्रभासित करनेके कारण ही वह प्रधान तीर्थ इस

पृथ्वीपर प्रभास नामसे विख्यात हुआ ।। ४१-४२ ।।

जनमेजय उवाच

कथं तु भगवन् सोमो यक्ष्मणा समगृह्यत ।