भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2731

और आलस्य छोड़कर अपने पिताके पास जाकर बोलीं—‘प्रभो! चन्द्रमा हमारे पास नहीं आते। वे सदा रोहिणीका ही सेवन करते हैं ॥ ५० ॥ ता वयं सहिताः सर्वास्त्वत्सकाशे प्रजेश्वर । वत्स्यामो नियताहारास्तपश्चरणतत्पराः ॥ ५१ ॥ ‘अतः प्रजेश्वर! हम सब बहिनें एक साथ नियमित आहार करके तपस्यामें संलग्न हो आपके ही पास रहेंगी’ ॥ श्रुत्वा तासां तु वचनं दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वाधर्मो महान् स्पृशेत् ॥ ५२ ॥ उनकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्षने चन्द्रमासे कहा—‘सोम! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समानतापूर्ण बर्ताव करो, जिससे तुम्हें महान् पाप न लगे’ ॥ ५२ ॥ तास्तु सर्वाब्रवीद् दक्षो गच्छध्वं शशिनोऽन्तिकम् । समं वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात् ॥ ५३ ॥ फिर दक्षने उन सभी कन्याओंसे कहा—‘अब तुमलोग चन्द्रमाके पास ही जाओ। वे मेरी आज्ञासे तुम सब लोगोंके प्रति समानभाव रखेंगे’ ॥ ५३ ॥ विसृष्टास्तास्तथा जग्मुः शीतांशुभवनं तदा । तथापि सोमो भगवान् पुनरेव महीपते ॥ ५४ ॥ रोहिणीं निवसत्येव प्रीयमाणो मुहुर्मुहुः । पृथ्वीनाथ! पिताके विदा करनेपर वे पुनः चन्द्रमाके घरमें लौट गयीं, तथापि भगवान् सोम फिर रोहिणीके पास ही अधिकाधिक प्रेमपूर्वक रहने लगे ॥ ५४ १/२ ॥ ततस्ताः सहिताः सर्वा भूयः पितरमब्रुवन् ॥ ५५ ॥ तव शुश्रूषणे युक्ता वत्स्यामो हि तवान्तिके । सोमो वसति नास्मासु नाकरोद् वचनं तव ॥ ५६ ॥ तब वे सब कन्याएँ पुनः एक साथ अपने पिताके पास जाकर बोलीं—‘हम सब लोग आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपके ही समीप रहेंगी। चन्द्रमा हमारे साथ नहीं रहते। उन्होंने आपकी बात नहीं मानी’ ॥ ५५-५६ ॥ तासां तद् वचनं श्रुत्वा दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वां शप्स्ये विरोचन ॥ ५७ ॥ उनकी बात सुनकर दक्षने पुनः सोमसे कहा—‘प्रकाशमान चन्द्रदेव! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समान बर्ताव करो, नहीं तो तुम्हें शाप दे दूँगा’ ॥ ५७ ॥ अनादृत्य तु तद् वाक्यं दक्षस्य भगवान् शशी । रोहिण्या सार्धमवसत् ततस्ताः कुपिताः पुनः ॥ ५८ ॥ गत्वा च पितरं प्राहुः प्रणम्य शिरसा तदा । सोमो वसति नास्मासु तस्मान्नः शरणं भव ॥ ५९ ॥