भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2733

कारणं ब्रूहि नः सर्वं येनेदं ते महत् भयम् ॥ ६७ ॥ श्रुत्वा तु वचनं त्वत्तो विधास्यामस्ततो वयम्। पृथ्वीनाथ! उस समय देवताओंने चन्द्रमासे मिलकर पूछा—‘आपका रूप ऐसा कैसे हो गया? यह प्रकाशित क्यों नहीं होता है? हमलोगोंसे सारा कारण बताइये, जिससे आपको महान् भय प्राप्त हुआ। आपकी बात सुनकर हमलोग इस संकटके निवारणका कोई उपाय करेंगे’ ॥ ६६-६७ १/२ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच सर्वांस्तान् शशलक्षणः ॥ ६८ ॥ शापस्य लक्षणं चैव यक्ष्माणं च तथाऽऽत्मनः। उनके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमाने उन सबको उत्तर देते हुए अपनेको प्राप्त हुए शापके कारण राजयक्ष्माकी उत्पत्ति बतलायी ॥ ६८ १/२ ॥ देवास्तथा वचः श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाब्रुवन् ॥ ६९ ॥ प्रसीद भगवन् सोमे शापोऽयं विनिवर्त्यताम्। उनका वचन सुनकर देवता दक्षके पास जाकर बोले—‘भगवन्! आप चन्द्रमापर प्रसन्न होइये और यह शाप हटा लीजिये ॥ ६९ १/२ ॥ असौ हि चन्द्रमाः क्षीणः किञ्चिच्छेषो हि लक्ष्यते ॥ ७० ॥ क्षयाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्चैव गताः क्षयम्। वीरुदोषधयश्चैव बीजानि विविधानि च ॥ ७१ ॥ ‘चन्द्रमा क्षीण हो चुके हैं और उनका कुछ ही अंश शेष दिखायी देता है। देवेश्वर! उनके क्षयसे लता, वीरुत्, ओषधियाँ भाँति-भाँतिके बीज और सम्पूर्ण प्रजा भी क्षीण हो गयी है ॥ ७०-७१ ॥ तेषां क्षये क्षयोऽस्माकं विनास्माभिर्जगच्च किम्। इति ज्ञात्वा लोकगुरो प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ७२ ॥ ‘उन सबके क्षीण होनेपर हमारा भी क्षय हो जायगा। फिर हमारे बिना संसार कैसे रह सकता है? लोकगुरो! ऐसा जानकर आपको चन्द्रदेवपर अवश्य कृपा करनी चाहिये’ ॥ ७२ ॥ एवमुक्तस्ततो देवान् प्राह वाक्यं प्रजापतिः। नैतच्छक्यं मम वचो व्यावर्तयितुमन्यथा ॥ ७३ ॥ हेतुना तु महाभागा निवर्तिष्यति केनचित्। उनके ऐसा कहनेपर प्रजापति दक्ष देवताओंसे इस प्रकार बोले—‘महाभाग देवगण! मेरी बात पलटी नहीं जा सकती। किसी विशेष कारणसे वह स्वतः निवृत्त हो जायगी ॥ ७३ १/२ ॥ समं वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यशः ॥ ७४ ॥ सरस्वत्या वरे तीर्थे उन्मज्जन् शशलक्षणः।