भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2738

उन्होंने यज्ञ और सोमपान कैसे किया? ब्रह्मन्! यदि यह प्रसंग मेरे सुननेयोग्य समझें तो अवश्य मुझे बतावें।। ५-६ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

आसन् पूर्वयुगे राजन् मुनयो भ्रातरस्त्रयः ।। ७ ।।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ।
सर्वे प्रजापतिसमाः प्रजावन्तस्तथैव च ।। ८ ।।
ब्रह्मलोकजितः सर्वे तपसा ब्रह्मवादिनः ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! पहले युगमें तीन सहोदर भाई रहते थे। वे तीनों ही मुनि थे। उनके नाम थे एकत, द्वित और त्रित। वे सभी महर्षि सूर्यके समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान संतानवान् और ब्रह्मवादी थे। उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्मलोकपर विजय प्राप्त की थी।। ७-८ १/२ ।।

तेषां तु तपसा प्रीतो नियमेन दमेन च ।। ९ ।।
अभवद् गौतमो नित्यं पिता धर्मरतः सदा ।
उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रियनिग्रहसे उनके धर्म-परायण पिता गौतम सदा ही प्रसन्न रहा करते थे।। ९ १/२ ।।

स तु दीर्घेण कालेन तेषां प्रीतिमवाप्य च ।। १० ।।
जगाम भगवान् स्थानमनुरूपमिवात्मनः ।
उन पुत्रोंकी त्याग-तपस्यासे संतुष्ट रहते हुए वे पूजनीय महात्मा गौतम दीर्घकालके पश्चात् अपने अनुरूप स्थान (स्वर्गलोक)-में चले गये।। १० १/२ ।।

राजानस्तस्य ये ह्यासन् याज्या राजन् महात्मनः ।। ११ ।।
ते सर्वे स्वर्गते तस्मिंस्तस्य पुत्रानपूजयन् ।
राजन्! उन महात्मा गौतमके यजमान जो राजा लोग थे, वे सब उनके स्वर्गवासी हो जानेपर उनके पुत्रोंका ही आदर-सत्कार करने लगे।। ११ १/२ ।।

तेषां तु कर्मणा राजंस्तथा चाध्ययनेन च ।। १२ ।।
त्रितः स श्रेष्ठतां प्राप यथैवास्य पिता तथा ।
नरेश्वर! उन तीनोंमें भी अपने शुभ कर्म और स्वाध्यायके द्वारा महर्षि त्रितने सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया! जैसे उनके पिता सम्मानित थे, वैसे ही वे भी हो गये।। १२ १/२ ।।

तथा सर्वे महाभागा मुनयः पुण्यलक्षणाः ।। १३ ।।
अपूजयन् महाभागं यथास्य पितरं तथा ।
महान् सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा सभी महर्षि भी महाभाग त्रितका उनके पिताके तुल्य ही सम्मान करते थे।।

कदाचिद्धि ततो राजन् भ्रातरावैकतद्वितौ ।। १४ ।।