महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2750, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारण था कि वहाँ यदुनन्दन बलरामजीको भी आश्चर्य हुआ? सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती किस कारणसे और किस प्रकार पूर्वदिशाकी ओर लौटी थीं? ।।
वैशम्पायन उवाच
पूर्वं कृतयुगे राजन् नैमिषेयास्तपस्विनः ।
वर्तमाने सुविपुले सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ ४१ ॥
ऋषयो बहवो राजंस्तत् सत्रमभिप्रेदिरे ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है वहाँ बारह वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले एक महान् यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया गया था। उस सत्रमें नैमिषारण्यनिवासी तपस्वी मुनि तथा अन्य बहुतसे ऋषि पधारे थे ॥ ४१ १/२ ॥
उषित्वा च महाभागास्तस्मिन् सत्रे यथाविधि ॥ ४२ ॥
निवृत्ते नैमिषेये वै सत्रे द्वादशवार्षिके ।
आजग्मुर्ऋषयस्तत्र बहवस्तीर्थकारणात् ॥ ४३ ॥
नैमिषारण्यवासियोंके उस द्वादशवर्षीय यज्ञमें वे महाभाग ऋषि दीर्घकालतक रहे। जब वह यज्ञ समाप्त हो गया तब बहुत-से महर्षि तीर्थसेवनके लिये वहाँ आये ॥
ऋषीणां बहुलत्वात्तु सरस्वत्या विशाम्पते ।
तीर्थानि नगरायन्ते कूले वै दक्षिणे तदा ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! ऋषियोंकी संख्या अधिक होनेके कारण सरस्वतीके दक्षिण तटपर जितने तीर्थ थे, वे सभी नगरोंके समान प्रतीत होने लगे ॥ ४४ ॥
समन्तपञ्चकं यावत्तावत्ते द्विजसत्तमाः ।
तीर्थलोभान्ररव्याघ्र नद्यास्तीरं समाश्रिताः ॥ ४५ ॥
पुरुषसिंह! तीर्थसेवनके लोभसे वे ब्रह्मर्षिगण समन्तपंचक तीर्थतक सरस्वती नदीके तटपर ठहर गये ॥
जुह्वतां तत्र तेषां तु मुनीनां भावितात्मनाम् ।
स्वाध्यायेनातिमहता बभूवुः पूरिता दिशः ॥ ४६ ॥
वहाँ होम करते हुए पवित्रात्मा मुनियोंके अत्यन्त गम्भीर स्वरसे किये जानेवाले स्वाध्यायके शब्दसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं ॥ ४६ ॥
अग्निहोत्रैस्ततस्तेषां क्रियमाणैर्महात्मनाम् ।
अशोभत सरिच्छ्रेष्ठा दीप्यमानैः समन्ततः ॥ ४७ ॥
चारों ओर प्रकाशित हुए उन महात्माओंद्वारा किये जानेवाले यज्ञसे सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४७ ॥
वालखिल्या महाराज अश्मकुट्टाश्च तापसाः ।
दन्तोलूखलिनश्चान्ये प्रसंख्यानास्तथा परे ॥ ४८ ॥