भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2752

राजन्! उस महानदीने यह सोच लिया था कि मैं इन ऋषियोंके आगमनको सफल बनाकर पुनः पश्चिम मार्गसे ही लौट जाऊँगी। यह सोचकर ही उसने वह महान् अद्भुत कर्म किया ।। ५६ ।। एवं स कुञ्जो राजन् वै नैमिषीय इति स्मृतः । कुरुश्रेष्ठ कुरुक्षेत्रे कुरुष्व महतीं क्रियाम् ।। ५७ ।। नरेश्वर! इस प्रकार वह कुंज नैमिषीय नामसे प्रसिद्ध हुआ। कुरुश्रेष्ठ! तुम भी कुरुक्षेत्रमें महान् कर्म करो ।। ५७ ।। तत्र कुञ्जान् बहून् दृष्ट्वा निवृत्तां च सरस्वतीम् । बभूव विस्मयस्तत्र रामस्याथ महात्मनः ।। ५८ ।। वहाँ बहुत-से कुंजों तथा लौटी हुई सरस्वतीका दर्शन करके महात्मा बलरामजीको बड़ा विस्मय हुआ ।। ५८ ।। उपस्पृश्य तु तत्रापि विधिवद् यदुनन्दनः । दत्त्वा दायान् द्विजातिभ्यो भाण्डानि विविधानि च ।। ५९ ।। भक्ष्यं भोज्यं च विविधं ब्राह्मणेभ्यः प्रदाय च । ततः प्रायाद् बलो राजन् पूज्यमानो द्विजातिभिः ।। ६० ।। यदुनन्दन बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके ब्राह्मणोंको धन और भाँति-भाँतिके बर्तन दान किये। राजन्! फिर उन्हें नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ देकर द्विजातियोंद्वारा पूजित होते हुए बलरामजी वहाँसे चल दिये ।। ५९-६० ।। सरस्वतीतीर्थवरं नानाद्विजगणायुतम् । बदरेङ्गुदकाश्मर्यप्लक्षाम्रत्थविभीतकैः ।। ६१ ।। कङ्कोलैश्च पलाशैश्च करीरैः पीलुभिस्तथा । सरस्वतीतीररुहैस्तरुभिर्विविधैस्तथा ।। ६२ ।। करूषकवरैश्चैव बिल्वैराम्रातकैस्तथा । अतिमुक्तकषण्डैश्च पारिजातैश्च शोभितम् ।। ६३ ।। कदलीवनभूयिष्ठं दृष्टिकान्तं मनोहरम् । वाय्वम्बुनफलपर्णादैर्दन्तोलूखलिकैरपि ।। ६४ ।। तथाश्मकुट्टैर्वान्यैर्मुनिभिर्बहुभिर्वृतम् । स्वाध्यायघोषसंघुष्टं मृगयूथशताकुलम् ।। ६५ ।। अहिंस्रैर्धर्मपरमैर्नृभिरत्यर्थसेवितम् । सप्तसारस्वतं तीर्थमाजगाम हलायुधः ।। ६६ ।। यत्र मङ्कणकः सिद्धस्तपस्तेपे महामुनिः ।। ६७ ।। तदनन्तर हलायुध बलदेवजी सप्तसारस्वत नामक तीर्थमें आये जो सरस्वतीके तीर्थोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। वहाँ अनेकानेक ब्राह्मणोंके समुदाय निवास करते थे। वेर, इंगुद, काश्मर्य