भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2770

आप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ७ ॥ अद्यप्रभृति नैवात्र भयं व्यालाद् भविष्यति । अपि चाल्पेन कालेन फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ८ ॥ 'आजसे जो मनुष्य महानदी सरस्वतीके इस तीर्थमें स्नान करेगा, उसे अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा। आजसे इस तीर्थमें किसीको सर्पसे भय नहीं होगा। थोड़े समयतक ही इस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको बहुत अधिक फल प्राप्त होगा' ॥ ७-८ ॥ एवमुक्त्वा महातेजा जगाम त्रिदिवं मुनिः । एवं सिद्धः स भगवानाष्टिषेणः प्रतापवान् ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर वे महातेजस्वी मुनि स्वर्गलोकको चले गये। इस प्रकार पूजनीय एवं प्रतापी आष्टिषेण ऋषि उस तीर्थमें सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं ॥ ९ ॥ तस्मिन्नेव तदा तीर्थे सिन्धुद्वीपः प्रतापवान् । देवापिश्च महाराज ब्राह्मण्यं प्राप्तुर्महत् ॥ १० ॥ महाराज! उन्हीं दिनों उसी तीर्थमें प्रतापी सिन्धुद्वीप तथा देवापिने वहाँ तप करके महान् ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥ १० ॥ तथा च कौशिकस्तात तपोनित्यो जितेन्द्रियः । तपसा वै सुतप्तेन ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् ॥ ११ ॥ तात! कुशिकवंशी विश्वामित्र भी वहीं निरन्तर इन्द्रिय-संयमपूर्वक तपस्या करते थे। उस भारी तपस्याके प्रभावसे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई ॥ ११ ॥ गाधिर्नाम महानासीत् क्षत्रियः प्रथितो भुवि । तस्य पुत्रोऽभवद् राजन् विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ १२ ॥ राजन्! पहले इस भूतपर गाधिनामसे विख्यात महान् क्षत्रिय राजा राज्य करते थे। प्रतापी विश्वामित्र उन्हींके पुत्र थे ॥ १२ ॥ स राजा कौशिकस्तात महायोग्योभवत् किल । स पुत्रमभिषिच्याथ विश्वामित्रं महातपाः ॥ १३ ॥ देहन्यासे मनश्चक्रे तमूचुः प्रणताः प्रजाः । न गन्तव्यं महाप्राज्ञ त्राहि चास्मान् महाभयात् ॥ १४ ॥ तात! लोग कहते हैं कि कुशिकवंशी राजा गाधि महान् योगी और बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुत्र विश्वामित्रको राज्यपर अभिषिक्त करके शरीरको त्याग देनेका विचार किया। तब सारी प्रजा उनसे नतमस्तक होकर बोली—'महाबुद्धिमान् नरेश! आप कहीं न जायें, यहीं रहकर हमारी इस जगत्के महान् भयसे रक्षा करते रहें' ॥ १३-१४ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच ततो गाधिः प्रजास्ततः । विश्वस्य जगतो गोप्ता भविष्यति सुतो मम ॥ १५ ॥