महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2772, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोऽस्मिंस्तीर्थवरे राजन् सरस्वत्याः समाहितः ।। २३ ।।
नियमैश्चोपवासैश्च कर्षयन् देहमात्मनः ।
राजन्! उन्होंने सरस्वतीके उस श्रेष्ठ तीर्थमें चित्तको एकाग्र करके नियमों और उपवासोंके द्वारा अपने शरीरको सुखाना आरम्भ किया ।। २३ १/२ ।।
जलाहारो वायुभक्षः पर्णाहारश्च सोऽभवत् ।। २४ ।।
तथा स्थण्डिलशायी च ये चान्ये नियमाः पृथक् ।
वे कभी जल पीकर रहते, कभी वायुको ही आहार बनाते और कभी पत्ते चबाकर रहते थे। सदा भूमिकी वेदी बनाकर उसपर सोते और तपस्यासम्बन्धी जो अन्य सारे नियम हैं, उनका भी पृथक्-पृथक् पालन करते थे ।। २४ १/२ ।।
असकृत्तस्य देवास्तु व्रतविघ्नं प्रचक्रिरे ।। २५ ।।
न चास्य नियमाद् बुद्धिरपयाति महात्मनः ।
देवताओंने उनके व्रतमें बारंबार विघ्न डाला; परंतु उन महात्माकी बुद्धि कभी नियमसे विचलित नहीं होती थी ।। २५ १/२ ।।
ततः परेण यत्नेन तप्त्वा बहुविधं तपः ।। २६ ।।
तेजसा भास्कराकारो गाधिजः समपद्यत ।
तदनन्तर महान् प्रयत्नके द्वारा नाना प्रकारकी तपस्या करके गाधिनन्दन विश्वामित्र अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ।। २६ १/२ ।।
तपसा तु तथा युक्तं विश्वामित्रं पितामहः ।। २७ ।।
अमन्यत महातेजा वरदो वरमस्य तत् ।
विश्वामित्रको ऐसी तपस्यासे युक्त देख महातेजस्वी एवं वरदायक ब्रह्माजीने उन्हें वर देनेका विचार किया ।। २७ १/२ ।।
स तु वव्रे वरं राजन् स्यामहं ब्राह्मणस्त्विति ।। २८ ।।
तथेति चाब्रवीद् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।
राजन्! तब उन्होंने यह वर माँगा कि 'मैं ब्राह्मण हो जाऊँ।' सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने उन्हें 'तथास्तु' कहकर वह वर दे दिया ।। २८ १/२ ।।
स लब्ध्वा तपसोग्रेण ब्राह्मणत्वं महायशाः ।। २९ ।।
विचचार महीं कृत्स्नां कृतकामः सुरोपमः ।
उस उग्र तपस्याके द्वारा ब्राह्मणत्व पाकर सफलमनोरथ हुए महायशस्वी विश्वामित्र देवताके समान समस्त भूमण्डलमें विचरने लगे ।। २९ १/२ ।।
तस्मिंस्तीर्थवरे रामः प्रदाय विविधं वसु ।। ३० ।।
पयस्विनीस्तथा धेनूर्यानानि शयनानि च ।
अथ वस्त्राण्यलङ्कारं भक्ष्यं पेयं च शोभनम् ।। ३१ ।।