भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2781

सैनापत्येन महता सुरारिविनिबर्हणम् ॥ ७ ॥ नरेश्वर! उसी तीर्थमें देवताओंने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले स्कन्दको महान् सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया था ॥ ७ ॥

तस्मिन् सारस्वते तीर्थे विश्वामित्रो महामुनिः । वसिष्ठं चालयामास तपसोग्रेण तच्छृणु ॥ ८ ॥ उसी सारस्वततीर्थमें महामुनि विश्वामित्रने अपनी उग्र तपस्यासे वसिष्ठमुनिको विचलित कर दिया था। वह प्रसंग सुनाता हूँ, सुनो ॥ ८ ॥

विश्वामित्रवसिष्ठौ तावहन्यहनि भारत । स्पर्धां तपःकृतां तीव्रां चक्रतुस्तौ तपोधनौ ॥ ९ ॥ भारत! विश्वामित्र और वसिष्ठ दोनों ही तपस्याके धनी थे, वे प्रतिदिन होड़ लगाकर अत्यन्त कठोर तप किया करते थे ॥ ९ ॥

तत्राप्याधिकसंतापो विश्वामित्रो महामुनिः । दृष्ट्वा तेजो वसिष्ठस्य चिन्तामभिजगाम ह ॥ १० ॥ उनमें भी महामुनि विश्वामित्रको ही अधिक संताप होता था, वे वसिष्ठका तेज देखकर चिन्तामग्न हो गये थे ॥ १० ॥

तस्य बुद्धिरियं ह्यासीद् धर्मनित्यस्य भारत । इयं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् ॥ ११ ॥ आनयिष्यति वेगेन वसिष्ठं तपतां वरम् । इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले विश्वामित्र मुनिके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह सरस्वती तपोधन वसिष्ठको अपने जलके वेगसे तुरंत ही मेरे समीप ला देगी और यहाँ आ जानेपर तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसिष्ठका मैं वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥

एवं निश्चित्य भगवान् विश्वामित्रो महामुनिः । सस्मार सरितां श्रेष्ठां क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥ ऐसा निश्चय करके पूज्य महामुनि विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे रक्तवर्ण हो गये। उन्होंने सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका स्मरण किया ॥ १३ ॥

सा ध्याता मुनिना तेन व्याकुलत्वं जगाम ह । जज्ञे चैनं महावीर्यं महाकोपं च भाविनी ॥ १४ ॥ उन मुनिके चिन्तन करनेपर विचारशीला सरस्वती व्याकुल हो उठी। उसे ज्ञात हो गया कि ये महान् शक्तिशाली महर्षि इस समय बड़े भारी क्रोधसे भरे हुए हैं ॥ १४ ॥

तत एनं वेपमाना विवर्णा प्राञ्जलिस्तदा । उपतस्थे मुनिवरं विश्वामित्रं सरस्वती ॥ १५ ॥