महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2784, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिर्बुद्धिरुमा तथा ।
त्वमेव वाणी स्वाहा त्वं तवायत्तमिदं जगत् ।। ३२ ।।
त्वमेव सर्वभूतेषु वससीह चतुर्विधा ।
‘तुम्हीं पुष्टि, कीर्ति, धृति, सिद्धि, बुद्धि, उमा, वाणी और स्वाहा हो। यह सारा जगत्
तुम्हारे अधीन है। तुम्हीं समस्त प्राणियोंमें चार* प्रकारके रूप धारण करके निवास करती
हो' ।। ३२ ।।
एवं सरस्वती राजन् स्तूयमाना महर्षिणा ।। ३३ ।।
वेगेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति ।
न्यवेदयत चाभीक्ष्णं विश्वामित्राय तं मुनिम् ।। ३४ ।।
राजन्! महर्षिके मुखसे इस प्रकार स्तुति सुनती हुई सरस्वतीने उन ब्रह्मर्षिको अपने
वेगद्वारा विश्वामित्रके आश्रमपर पहुँचा दिया और विश्वामित्रसे बारंबार निवेदन किया कि
‘वसिष्ठ मुनि उपस्थित हैं' ।। ३३-३४ ।।
तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः ।
अथान्वेषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ।। ३५ ।।
सरस्वतीद्वारा लाये हुए वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र कुपित हो उठे और उनके
जीवनका अन्त कर देनेके लिये कोई हथियार ढूँढ़ने लगे ।। ३५ ।।
तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्मवध्याभयान्नदी ।
अपोवाह वसिष्ठं तु प्राचीं दिशमतन्द्रिता ।। ३६ ।।
उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ।
उन्हें कुपित देख सरस्वती नदी ब्रह्महत्याके भयसे आलस्य छोड़ दोनोंकी आज्ञाका
पालन करती हुई विश्वामित्रको धोखा देकर वसिष्ठ मुनिको पुनः पूर्व-दिशाकी ओर बहा ले
गयी ।। ३६ ।।
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।। ३७ ।।
अब्रवीद् दुःखसंक्रुद्धो विश्वामित्रो ह्यमर्षणः ।
यस्मान्मां त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चयित्वा पुनर्गता ।। ३८ ।।
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसम्मतम् ।
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुनः अपनेसे दूर बहाया गया देख अमर्षशील विश्वामित्र दुःखसे
अत्यन्त कुपित हो बोले—‘सरिताओंमें श्रेष्ठ कल्याणमयी सरस्वती! तुम मुझे धोखा देकर
फिर चली गयी, इसलिये अब जलकी जगह रक्त बहाओ, जो राक्षसोंके समूहको अधिक
प्रिय है' ।। ३७-३८ ।।
ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता ।। ३९ ।।
अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ।