भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2799

महामति ब्रह्माने जगत्के भिन्न-भिन्न पदार्थोंके ऊपर देवता, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, भूत, नाग और पक्षियोंका आधिपत्य पहलेसे ही निर्धारित कर रखा था। साथ ही वे कुमारको भी आधिपत्य करनेमें समर्थ मानते थे॥ ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा देवानां श्रेयसि स्थितः। सैनापत्यं ददौ तस्मै सर्वभूतेषु भारत ॥ ४९ ॥ भरतनन्दन! तदनन्तर देवगणोंके मंगल-सम्पादनमें तत्पर हुए ब्रह्माने दो घड़ीतक चिन्तन करनेके पश्चात् सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ कार्तिकेयको सम्पूर्ण देवताओंका सेनापति पद प्रदान किया ॥ ४९ ॥ सर्वदेवनिकायानां ये राजानः परिश्रुताः। तान् सर्वान् व्यादिदेशास्मै सर्वभूतपितामहः ॥ ५० ॥ जो सम्पूर्ण देवसमूहोंके राजारूपमें विख्यात थे, उन सबको सर्वभूतपितामह ब्रह्माने कुमारके अधीन रहनेका आदेश दिया ॥ ५० ॥ ततः कुमारमादाय देवा ब्रह्मपुरोगमाः। अभिषेकार्थमाजग्मुः शैलेन्द्रं सहितास्ततः ॥ ५१ ॥ पुण्यां हैमवतीं देवीं सरिच्छ्रेष्ठां सरस्वतीम्। समन्तपञ्चके या वै त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ५२ ॥ तब ब्रह्मा आदि देवता अभिषेकके लिये कुमारको लेकर एक साथ गिरिराज हिमालयपर वहाँसे निकली हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला सरस्वती देवीके तटपर गये, जो समन्त-पंचकतीर्थमें प्रवाहित होकर तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ तत्र तीरे सरस्वत्याः पुण्ये सर्वगुणान्विते। निषेदुर्देवगन्धर्वाः सर्वे सम्पूर्णमानसाः ॥ ५३ ॥ वहाँ वे सभी देवता और गन्धर्व पूर्ण मनोरथ हो सरस्वतीके सर्वगुणसम्पन्न पावन तटपर विराजमान हुए ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने कुमाराभिषेकोपक्रमे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें कुमारके अभिषेककी तैयारीविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥


* ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, इन्द्राणी, वाराही तथा चामुण्डा—ये सात मातृकाएँ हैं।