महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 285, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंघातो राजपुत्राणां सर्वेषामभवत् तदा ॥ १४ ॥ उसमें आरोंके स्थानमें सूर्यके समान तेजस्वी राजकुमार खड़े किये गये थे। उस समय वहाँ समस्त राजकुमारोंका समुदाय उपस्थित हो गया था ॥ १४ ॥
कृताभिसमयाः सर्वे सुवर्णविकृतध्वजाः । रक्ताम्बरधराः सर्वे सर्वे रक्तविभूषणाः ॥ १५ ॥ उन सबने प्राणोंके रहते युद्धसे विमुख न होनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी। उन सबकी ध्वजाएँ सुवर्णमयी थीं, सबने लाल वस्त्र धारण कर रखे थे और सबके आभूषण भी लाल रंगके ही थे ॥ १५ ॥
सर्वे रक्तपताकाश्च सर्वे वै हेममालिनः । चन्दनागुरुदिग्धाङ्गा स्रग्विणः सूक्ष्मवाससः ॥ १६ ॥ सबके रथोंपर लाल रंगकी पताकाएँ फहरा रही थीं, सबने सोनेकी मालाएँ पहन रखी थीं, सबके अंगोंमें चन्दन और अगुरुका लेप किया गया था और सभी फूलोंके गजरों तथा महीन वस्त्रोंसे सुशोभित थे ॥ १६ ॥
सहिताः पर्यधावन्त कार्ष्णिं प्रति युयुत्सवः । तेषां दश सहस्राणि बभूवुर्दृढधन्विनाम् ॥ १७ ॥ वे सब एक साथ युद्धके लिये उत्सुक होकर अर्जुनपुत्र अभिमन्युकी ओर दौड़े। सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले उन आक्रमणकारी वीरोंकी संख्या दस हजार थी ॥ १७ ॥
पौत्रं तव पुरस्कृत्य लक्ष्मणं प्रियदर्शनम् । अन्योन्यसमदुःखास्ते अन्योन्यसमसाहसाः ॥ १८ ॥ उन्होंने आपके प्रियदर्शन पौत्र लक्ष्मणको आगे करके धावा किया था। उन सबने एक-दूसरेके दुःखको समान समझा था और वे परस्पर समानभावसे साहसी थे ॥ १८ ॥
अन्योन्यं स्पर्धमानाश्च अन्योन्यस्य हिते रताः । दुर्योधनस्तु राजेन्द्र सैन्यमध्ये व्यवस्थितः ॥ १९ ॥ वे एक-दूसरेसे होड़ लगाये रखते थे और आपसमें एक-दूसरेके हित-साधनमें तत्पर रहते थे। राजेन्द्र! राजा दुर्योधन सेनाके मध्यभागमें विराजमान था ॥ १९ ॥
कर्णदुःशासनकृपैर्वृतो राजा महारथैः । देवराजोपमः श्रीमाञ्श्वेतच्छत्राभिसंवृतः ॥ २० ॥ उसके ऊपर श्वेतच्छत्र तना हुआ था। वह कर्ण, दुःशासन तथा कृपाचार्य आदि महारथियोंसे घिरकर देवराज इन्द्रके समान शोभा पा रहा था ॥ २० ॥
चामरव्यजनाक्षेपैरूदयन्निव भास्करः । प्रमुखे तस्य सैन्यस्य द्रोणोऽवस्थितनायकः ॥ २१ ॥ उसके दोनों ओर चँवर और व्यजन डुलाये जा रहे थे। वह उदयकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। उस सेनाके अग्रभागमें सेनापति द्रोणाचार्य खड़े थे ॥ २१ ॥