महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2853, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् असितने मित्र, वरुण और आदित्योंके लोकोंमें पहुँचे हुए जैगीषव्यको देखा ।। ३९ १/२ ।।
रुद्राणां च वसूनां च स्थानं यच्च बृहस्पतेः ।। ४० ।।
तानि सर्वाण्यतीतानि समपश्यत् ततोऽसितः ।
तदनन्तर रुद्र, वसु और बृहस्पतिके जो स्थान हैं, उन सबको लाँघकर ऊपर उठे हुए जैगीषव्यका असित देवलने दर्शन किया ।। ४० १/२ ।।
आरुह्य च गवां लोकं प्रयातो ब्रह्मसत्रिणाम् ।। ४१ ।।
लोकानपश्यद् गच्छन्तं जैगीषव्यं ततोऽसितः ।
इसके बाद असितने गौओंके लोकमें जाकर जैगीषव्यको ब्रह्मसत्र करनेवालोंके लोकोंमें जाते देखा ।।
त्रींल्लोकानपरान् विप्रमुत्पतन्तं स्वतेजसा ।। ४२ ।।
पतिव्रतानां लोकांश्च व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत ।
तत्पश्चात् देवलने देखा कि विप्रवर जैगीषव्य मुनि अपने तेजसे ऊपर-ऊपरके तीन लोकोंको लाँघकर पतिव्रताओंके लोकमें जा रहे हैं ।। ४२ १/२ ।।
ततो मुनिवरं भूयो जैगीषव्यमथासितः ।। ४३ ।।
नान्वपश्यत लोकस्थमन्तर्हितमरिंदम ।
शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! इसके बाद असितने मुनिवर जैगीषव्यको पुनः किसी लोकमें स्थित नहीं देखा। वे अदृश्य हो गये थे ।। ४३ १/२ ।।
सोऽचिन्तयन्महाभागो जैगीषव्यस्य देवलः ।। ४४ ।।
प्रभावं सुव्रतत्वं च सिद्धिं योगस्य चातुलाम् ।
तत्पश्चात् महाभाग देवलने जैगीषव्यके प्रभाव, उत्तम व्रत और अनुपम योगसिद्धिके विषयमें विचार किया ।।
असितोऽपृच्छत तदा सिद्धाँल्लोकेषु सत्तमान् ।। ४५ ।।
प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा धीरस्तान् ब्रह्मसत्रिणः ।
जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसध्वं महौजसम् ।। ४६ ।।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
इसके बाद धैर्यवान् असितने उन लोकोंमें रहनेवाले ब्रह्मयाजी सिद्धों और साधु पुरुषोंसे हाथ जोड़कर विनीतभावसे पूछा—'महात्माओ! मैं महातेजस्वी जैगीषव्यको अब देख नहीं रहा हूँ। आप उनका पता बतावें। मैं उनके विषयमें सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है' ।। ४५-४६ १/२ ।।
सिद्धा ऊचुः
शृणु देवल भूतार्थं शंसतां नो दृढव्रत ।। ४७ ।।