महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2860, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ब्रह्मर्षे! यह आपका पुत्र है। इसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण किया था। ब्रह्मर्षे! पहले अलम्बुषा नामक अप्सराको देखकर जो आपका वीर्य स्खलित हुआ था, उसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण कर लिया था; क्योंकि मेरे मनमें यह विचार हुआ था कि आपका यह तेज नष्ट न होने पावे। अतः आप मेरे दिये हुए अपने इस अनिन्दनीय पुत्रको ग्रहण कीजिये’ ।। १३-१४ १/२ ।।
इत्युक्तः प्रतिजग्राह प्रीतिं चावाप पुष्कलाम् ।। १५ ।।
स्वसुतं चाप्यजिघ्रत् तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ।
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम ।। १६ ।।
सरस्वत्यै वरं प्रादात् प्रीयमाणो महामुनिः ।
विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। १७ ।।
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा ।
उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस पुत्रको ग्रहण कर लिया और वे बड़े प्रसन्न हुए। भरतभूषण! उन द्विजश्रेष्ठने बड़े प्रेमसे अपने उस पुत्रका मस्तक सूँघा और दीर्घ-कालतक छातीसे लगाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए महामुनिने सरस्वतीको वर दिया—‘सुभगे! तुम्हारे जलसे तर्पण करनेपर विश्वेदेव, पितृगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय सभी तृप्ति-लाभ करेंगे’ ।। १५-१७ १/२ ।।
इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् ।। १८ ।।
प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव ।
राजन्! ऐसा कहकर अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल हृदयसे मुनिने प्रेमपूर्वक उत्तम वाणीद्वारा सरस्वती देवीका स्तवन किया। उस स्तुतिको तुम यथार्थरूपसे सुनो ।। १८ १/२ ।।
प्रसुतासि महाभागे सरसो ब्रह्मणः पुरा ।। १९ ।।
जानन्ति त्वां सरिच्छ्रेष्ठे मुनयः संशितव्रताः ।
मम प्रियकरी चापि सततं प्रियदर्शने ।। २० ।।
तस्मात् सारस्वतः पुत्रो महांस्ते वरवर्णिनि ।
तवैव नाम्ना प्रथितः पुत्रस्ते लोकभावनः ।। २१ ।।
‘महाभागे! तुम पूर्वकालमें ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो। सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि तुम्हारी महिमाको जानते हैं। प्रियदर्शने! तुम सदा मेरा भी प्रिय करती रही हो; अतः वरवर्णिनि! तुम्हारा यह लोकभावन महान् पुत्र तुम्हारे ही नामपर ‘सारस्वत’ कहलायेगा ।। १९—२१ ।।
सारस्वत इति ख्यातो भविष्यति महातपाः ।
एष द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजर्षभान् ।। २२ ।।
सारस्वतो महाभागे वेदानध्यापयिष्यति ।